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बुधवार, 29 अप्रैल 2015

ये ख़ुराफ़ात...

इश्क़  की  बात  मत  कीजिए
ये    ख़ुराफ़ात    मत  कीजिए

'कौन  हैं'  'किसलिए  आए  हैं'
यूं    सवालात    मत  कीजिए

वस्ल  का   हौसला   ही  न  हो
तो   मुलाक़ात    मत  कीजिए

दोस्त     हैं,     दोस्ती   ही  रहे
कुछ  इज़ाफ़ात  मत  कीजिए

रूह   पर    बार     बनने   लगें
वो     इनायात   मत  कीजिए

हम  कहां,  शाहे-वहशत  कहां
फ़ालतू     बात   मत  कीजिए

लीजिए,   आ   गए     रू-ब-रू
अब  मुनाजात   मत  कीजिए

ज़लज़लों   से    ढहे    शह्र  में
या  ख़ुदा ! रात  मत  कीजिए  !

                                                              (2015)

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: ख़ुराफ़ात: उपद्रव; सवालात: प्रश्न (बहु.); वस्ल: मिलन; हौसला: साहस, मनोबल; इज़ाफ़ात: अभिवृद्धियां; बार: बोझ, भार;  इनायात: कृपाएं, देन; शाहे-वहशत: वन्य मनोवृत्ति का राजा; फ़ालतू: निरर्थक;
रू-ब-रू: प्रत्यक्ष, मुखामुख; मुनाजात: स्तुति-गान; ज़लज़लों: भूकंपों ।


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