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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

करो हो क़त्ल ....

परेशां  हैं  यहां  तो  थे  वहां  भी
करे  है  तंज़  हम  पर  मेह्र्बां  भी

हमें  ज़ाया  न  समझें  साहिबे-दिल
हरारत  है  अभी  बाक़ी  यहां  भी

दिए  थे  जो  वफ़ा  के  ज़ख़्म  तुमने
लगे  हैं  फिर  नए  से  वो  निशां  भी
 लगा  है  मर्ज़  जबसे  दिलकशी  का
करो  हो  क़त्ल  जाओ  हो  जहां  भी

बुज़ुर्गों  ने    बहुत     बहलाए  रक्खा
मगर  बेताब  हैं     अब   नौजवां  भी

ख़बर  होगी  तभी  अह् ले  वतन  को
लुटेंगे     जब        अमीरे  कारवां  भी

जहां  को     नूर  वो     दे  जाएंगे  हम
करेगा  फ़ख़्र     हम  पर   आस्मां  भी !

                                                                             (2018)

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तंज़: व्यंग्य; मेह्रबां: भले मानुस, कृपालु; ज़ाया: नष्टप्राय, व्यर्थ; साहिबे दिल: हृदयवान, संवेदनशील; हरारत: ऊष्मा, इच्छाएं; वफ़ा: निष्ठा; ज़ख़्म: घाव; निशां: चिह्न; मर्ज़: रोग; दिलकशी: मन जीतने, चित्ताकर्षक लगने; करो हो: करते हो; क़त्ल:  हत्या; जाओ हो: जाते हो; बुज़ुर्गों: वरिष्ठ जन; बेताब: व्याकुल; नौजवां: युवजन; ख़बर: बोध; अह् ले वतन: देशवासी; अमीरे कारवां: यात्री दाल के नायक, सत्ताधीश; जहां: संसार; नूर: प्रकाश; फ़ख़्र: गर्व; आस्मां: विधाता।  

रविवार, 22 अप्रैल 2018

बग़ावत का सैलाब ...

मोहसिनों   की    आह    बेपर्दा  न  हो
शर्म  से    मर  जाएं   हम  ऐसा  न  हो

इश्क़  का  इल्ज़ाम  हम  पर  ही  सही
तू   अगर    ऐ  दोस्त     शर्मिंदा  न  हो

ख़ाक   ऐसी  ज़ीस्त  पर    के:  ग़ैर  के
दर्द  का   एहसास  तक   ज़िंदा  न  हो

बेबसी  से     आस्मां   तक       रो  पड़े
ज़ुल्म    नन्ही  जान  पर   इतना  न  हो

अब     बग़ावत  का    उठे  सैलाब  वोः
जो  कभी     तारीख़   ने    देखा  न  हो

ऐहतरामे-नूर         यूं        कर  देखिए
सर  झुका  हो  और   बा-सज्दा  न  हो

कोई  तो    रक्खे  हमें    दिल  में  कहीं
आख़िरत  का  वक़्त  यूं  ज़ाया   न   हो !

                                                                            (2018)

                                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मोहसिनों: कृपालु जन; बेपर्दा: प्रकट, अनावृत्त; इल्ज़ाम: आरोप; शर्मिंदा: लज्जित; ख़ाक: धूल; ज़ीस्त: जीवन; ग़ैर: अन्य; एहसास: अनुभूति; बग़ावत: विद्रोह; सैलाब: बाढ़; तारीख़: इतिहास; बेबसी: विवशता; आस्मां: नियति; ज़ुल्म: अन्याय, अत्याचार; ऐहतरामे-नूर: (ईश्वरीय) प्रकाश का सम्मान, सम्बोधि का सम्मान; बा-सज्दा: श्रद्धावनत; आख़िरत: अंतिम समय; ज़ाया: व्यर्थ।  

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

क्या मिल गया ?

गर्दिशे-ऐयाम  से            दिल  हिल  गया
आज  का  दिन  भी  बहुत  मुश्किल  गया

देख  कर  हमको              परेशां  दर्द  से
आसमानों  का  कलेजा            हिल  गया

चाहते  थे        रोक  लें           तूफ़ान  को
सब्र  टूटा        हाथ  से         साहिल  गया

क़ातिलों  की             पैरवी      करते  हुए
साफ़  कहिए  रहबरों !     क्या  मिल  गया

शाह  की       लफ़्फ़ाज़ियों  में       यूं  फंसे 
नौजवां  से      दूर            मुस्तक़्बिल  गया

राह    मुश्किल  थी     बग़ावत  की    मगर
हर  जियाला              जानिबे-मंज़िल  गया

हालते-अत्फ़ाले-दुनिया               देख  कर
क्या  बताएं      रूह  में     क्या  छिल  गया !

                                                                                   (2018)

                                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: गर्दिशे-ऐयाम : दिनों का फेर; सब्र: धैर्य; साहिल: तट, किनारा; क़ातिलों: हत्यारों; पैरवी : पक्ष रखना, बचाव; रहबरों : नेता गण; लफ़्फ़ाज़ियों : शब्दजाल; मुस्तक़्बिल : भविष्य; बग़ावत : विद्रोह; जियाला : साहसी; जानिबे-मंज़िल : लक्ष्य की ओर; हालते-अत्फ़ाले-दुनिया : संसार के बच्चों की स्थिति; रूह : आत्मा।