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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

दाव:-ए-हस्रते-दिल ...

उलझनों  से  भरा  दिल  नहीं  चाहिए
मुफ़्त  में  कोई  मुश्किल  नहीं  चाहिए

जान  ले  जाइए  ग़म  न  होगा  हमें
दाव:-ए-हस्रते-दिल    नहीं  चाहिए

बात  ईमान  की  है  वफ़ा  की  नहीं
इश्क़  में  कोई  हासिल  नहीं  चाहिए

आबले-पाऊं     देते  रहें     हौसला
हर  क़दम  पर  मराहिल  नहीं  चाहिए

रोकने    आए  हैं    राह  तूफ़ान  की
फ़त्ह  से  क़ब्ल   साहिल  नहीं  चाहिए

जीत  या  हार  किरदार  का  खेल  है
जंगे-मैदां   में  बुज़दिल  नहीं  चाहिए

साथ  में  चल  रहा  है  हमारा  क़फ़न
मेह्र्बानि-ए-क़ातिल      नहीं  चाहिए  !

                                                                      (2017)

                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दाव:-ए-हस्रते-दिल : मन की इच्छाओं पर नियंत्रण; ईमान : आस्था; वफ़ा : निष्ठा; हासिल : उपलब्धि; आबले-पाऊं : पांव के छाले; हौसला : साहस; मराहिल : पड़ाव, विश्राम-स्थल; तूफ़ान : झंझावात; फ़त्ह : विजय;   क़ब्ल : पूर्व; साहिल : तट, किनारा; किरदार : चरित्र, व्यक्तित्व; जंगे-मैदां : मैदानी युद्ध; बुज़दिल : कायर मेह्र्बानि-ए-क़ातिल : हत्यारे की कृपा। 

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

सवालाते-दिल ...

ढूंढते  ही  रहे    हम        निशानाते-दिल
बांट  कर    आ  गए    लोग   ख़ैराते-दिल

मा'निए-इश्क़  तक    तो    समझते  नहीं
आप  क्यूं      चाहते  हैं      इनायाते-दिल

आपकी    ख़्वाहिशो-ख़्वाब  से    भी  परे
और  भी  हैं    बहुत-से     सवालाते-दिल

हम  कहें  और  उन  पर  असर  भी  न  हो
रोक  कर    देख  लें   अब  ख़ुराफ़ाते-दिल

रिंद  कम      शैख़  ज़्यादः       परेशान  हैं
बंद     जबसे      हुई  है      ख़राबाते-दिल

बिन  बुलाए     उतर  आए    वो   अर्श  से
और  क्या      देखिएगा      करामाते-दिल

हम  नहीं  तुम  नहीं   मीर-ो-ग़ालिब  नहीं
कौन  सुलझाएगा  फिर  तिलिस्माते-दिल  ?!

                                                                                      ( 2017 )

                                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: निशानाते-दिल : चिह्न, प्रमाण; ख़ैरात : भिक्षा; मा'निए-इश्क़ : प्रेम के अर्थ; इनायात : कृपाएं; ख़्वाहिशो-ख़्वाब : इच्छाओं एवं स्वप्नों; सवालात : प्रश्न, समस्याएं; ख़ुराफ़ात : उपद्रव; रिंद : मदिरा-प्रेमी; शैख़ : उपदेशक; ख़राबात : मदिरालय; अर्श : आकाश, स्वर्ग; करामात : चमत्कार; मीर, ग़ालिब : उर्दू के महानतम शायर द्वय; तिलिस्मात : रहस्य।  

रविवार, 16 अप्रैल 2017

गुलज़ार बाज़ारे-दिल ...

ख़ौफ़  में  जी  रहे  हैं  तरफ़दारे-दिल
घूमते  हैं  खुले   अब   गुनह्गारे-दिल

मुत्मईं  हैं  कि  मग़रिब  न  होगी  कभी
तीरगी  को  समझते  हैं   अन्वारे-दिल

ख़ुश्बू-ए-यार  से  तर  हवा  की  क़सम
ठीक  लगते  नहीं  आज  आसारे-दिल

कोई  क़ीमत  रही  ही  नहीं  इश्क़  की
हर  गली  में  हैं  गुलज़ार   बाज़ारे-दिल

सख़्तजानी-ए-हालात        क्या  पूछिए
मांगते  हैं  लहू    रोज़     किरदारे-दिल

उम्र  भर  जो  अक़ीदत  से  ख़ाली  रहे
आख़िरश  हो  गए    वो  परस्तारे-दिल

आख़िरत  के  लिए    हमसफ़र  चाहिए
ग़ौर  से  पढ़  रहे  हैं  वो  अख़बारे-दिल

एक  ग़ालिब  ही  हम  पर  मेह्र्बां  नहीं
मीर  भी  हैं     हमारे    तलबगारे- दिल  !

                                                                         (2017)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ : 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

दिल का गुमां...

मुहब्बत  न  हो  तो  जहां  क्या  करेगा
ज़मीं  के  बिना   आस्मां   क्या   करेगा

नफ़स  दर  नफ़स  दिल  जहां  टूटते  हों
वहां  कोई  दिल  का  गुमां  क्या  करेगा

यहां   बात    है    मेरी   तन्हाइयों  की
क़फ़स  में  मदद  मेह्रबां  क्या  करेगा

न  दीवारो-दर  है  न  साया  ख़ुदा  का
हिफ़ाज़त  मेरा  आशियां  क्या  करेगा

रग़ों  में   रवां  हो  जहालत  जहां  पर 
बयां  कोई  अह् ले-ज़ुबां  क्या  करेगा

मुसाफ़िर  तड़प  ही  न  पालें  जिगर  में
तो  सर  मंज़िलें  कारवां  क्या  करेगा

कमां  सौंप  दी  हाथ  में  क़ातिलों  के
ये    जम्हूरे-हिंदोस्तां  क्या  करेगा  ?!

                                                                      (2017)

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः जहां: संसार; ज़मीं : पृथ्वी, आधार; आस्मां : आकाश, ईश्वर; नफ़स: श्वांस; गुमां: गर्व, अहंकार; क़फ़स : पिंजरा, कारागार; 
मेह्रबां : कृपा करने वाला; दीवारो-दर : भित्ति एवं द्वार; साया : छाया; हिफ़ाज़त: सुरक्षा; आशियां : आवास; रग़ों : शिराओं; रवां: प्रवाहमान; जहालत : मूढ़ता; बयां : कथन, उल्लेख, वर्णन; अह् ले-जुबां : भाषाविद, साहित्यकार; जिगर : हृदय; सर : विजित; मंज़िलें : लक्ष्य; 
कारवां : यात्री-दल; कमां : नियंत्रण, सत्ता-सूत्र; जम्हूरे-हिंदोस्तां : भारतीय लोकतंत्र। 




रविवार, 26 मार्च 2017

मौक़ा नहीं मिला ...

हमको  तेरे  विसाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला
इस  पर  तुझे  ख़याल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

ताउम्र  तेरी  फ़िक्र  हमें   इस  तरह  रही
ख़ुद  अपनी  देखभाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

जो  शख़्स  मेरे  साथ  बहुत  दूर  तक  चला
उससे  भी  अर्ज़े-हाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

एहसास  था  उसे  कि  मेरा  दिल  दुखा  दिया
लेकिन  उसे  मलाल  का   मौक़ा  नहीं  मिला

अरमान  था  उन्हें  कि  मेरा  सर  झुका  सकें
आंखों  के  इस्तेमाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

दिल  की  गली  में  आग  लगाने  चले  थे  वो
आशिक़  के  घर  बवाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

हमने  ख़ुदा  को  तूर  पे  ला  कर  दिखा  दिया
दुनिया  को  फिर  सवाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला !

                                                                                      (2017)

                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः विसाल: दर्शन; ख़याल: विचार, चिंता; शख़्स: व्यक्ति; अर्ज़े-हाल: स्थिति बताना; ताउम्र: आजीवन; एहसास: अनुभूति; मलाल: खेद; अरमान: इच्छा; इस्तेमाल: प्रयोग; आशिक़: प्रेमी; बवाल: उत्पात; तूर: अरब के साम क्षेत्र में एक मिथकीय पर्वत, जहां हज़रत मूसा अ. स. के बुलाने पर ईश्वर के प्रकट होने का आख्यान है।  

शनिवार, 25 मार्च 2017

ज़ीस्त का इंतज़ार...

शाह  पर  एतबार  किसको  है
ये:  दिमाग़ी  बुख़ार  किसको  है

हाकिमों  की  अदा  गवाही  है
हैसियत  का  ख़ुमार  किसको  है

ज़ार  सबको  थमा  गया  कासा
दिक़्क़ते-रोज़गार   किसको  है

थक  गए  जिस्म  .गुंच:-ओ-गुल  के
अब  उमीदे-बहार  किसको  है

हम  फ़क़ीरी  में  मस्त  हैं  अपनी
चाहते-इक़्तिदार  किसको  है

मौत  सफ़  में  लगा  गई  जबसे
ज़ीस्त  का  इंतज़ार  किसको  है

देख  लेंगे  नमाज़  भी  पढ़  कर
आस्मां   पर  क़रार  किसको  है !

                                                                    (2017)

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः एतबार: विश्वास; हाकिमों: सत्ताधारियों, अधिकारियों; अदा: भंगिमा; गवाही: साक्ष्य; हैसियत: प्रास्थिति; ख़ुमार: मद; ज़ार: अत्याचारी शासक; कासा: भिक्षा-पात्र; दिक़्क़ते-रोज़गार: आजीविका की कठिनाई; जिस्म: शरीर; .गुंच:-ओ-गुल: कलियां और फूल; उमीदे-बहार: बसंत की आशा; फ़क़ीरी: सधुक्कड़ी, निर्धनता; चाहते-इक़्तिदार: सत्ता-प्राप्ति की इच्छा; सफ़: पंक्ति; ज़ीस्त: जीवन; क़रार: आश्वस्ति।  


शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मसख़रों का ज़माना ...

ख़रों  को  मुबारक  ख़रों  का  ज़माना
अजब  सरफिरे   रहबरों  का  ज़माना

न  देखेगी  नरगिस  न  गाएगी  बुलबुल
न  आएगा     दीदावरों  का    ज़माना

जहां  मौसिक़ी  की  इजाज़त  न  होगी
वहां  क्या  करेगा    सुरों  का  ज़माना

जिन्होंने  चुना  है  बड़े  शौक़  से  अब
निभाएं  वही    मसख़रों  का   ज़माना

ये  जम्हूर  आख़िर  कहां  तक  सहेगा
सियासत  के   बाज़ीगरों  का  ज़माना

चुराने  लगा   मुफ़लिसों  की   कमाई
नई   तर्ज़  के   मुख़बिरों  का  ज़माना

यही  वक़्त  है  लाल  परचम  उठाओ
बदल  दो   बड़े  साहिरों  का  ज़माना

मुहब्बत   बसाएगी   वो  घर   दोबारा
मिटाएगा  जो   ताजिरों  का   ज़माना !

                                                                (2016)

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः ख़रों : गधों; रहबरों: नेताओं; नरगिस: एक फूल, जिसकी एक पंखुड़ी में आंख के समान आकृति बनी होती है; बुलबुल: कोयल; दीदावरों: दृष्टि-संपन्न व्यक्तियों; मसख़रों: भांडों; जम्हूर: लोकतंत्र; सियासत: राजनीति; बाज़ीगरों: खिलाड़ियों; परचम: ध्वज, पताका; मुफ़लिसों: वंचितों, दीन हीनों; तर्ज़: शैली; साहिरों: जादूगरों, मायावियों; मुख़बिरों: टोह लेने वालों; ताजिरों: व्यापारियों, पूंजीपतियों।  


रविवार, 5 मार्च 2017

फ़रेब सीरत के ...

मुद्द'आ  यूं  मिटा  तमाशों  में
दब  गई  आह  ढोल-ताशों  में

सोज़े-तकरीर  हुस्न  खो  बैठा
तल्ख़  तन्क़ीदो-इफ़्तिराशों  में

शक्ले-इंसां  नज़र  नहीं  आती
मसख़रों  से  भरी  क़िमाशों  में

रहनुमा  आए  हैं  दवा  ले कर
फूंकने  जान    सर्द  लाशों  में

हैं  नुमाया  फ़रेब  सीरत  के
शाह  के  रेशमी  क़ुमाशों  में 

गंद  में  जिस्म  सन  गया  सारा
साफ़  किरदार  की  तलाशों  में

खेलिए  क्या  ग़रीब  के  दिल  से
.खूं  छलक  आएगा  ख़राशों  में !

                                                                  (2017)

                                                           -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मुद्द'आ: विषय; सोज़े-तकरीर: भाषण का माधुर्य; हुस्न: सौंदर्य; तल्ख़: तीक्ष्ण; तन्क़ीदो-इफ़्तिराशों: टिप्पणियों एवं निंदाओं; शक्ले-इंसां: मनुष्य का रूप; मसख़रों: भांडों; क़िमाशों: ताश की गड्डियों; रहनुमा: मार्ग दिखाने वाले, नेता गण; सर्द लाशों: ठंडे शवों; नुमाया: प्रकट; फ़रेब: छद्म; सीरत: चरित्र, स्वभाव; क़ुमाशों: वस्त्र-विन्यास, रूप-सज्जा; गंद: मलिनता; जिस्म: देह; किरदार: चरित्र, व्यक्तित्व; तलाशों: अनुसंधानों; .खूं : रक्त, ख़राशों: खरोंचों ।


 

बुधवार, 1 मार्च 2017

खिलेंगे ख़ुद-ब-ख़ुद ...

जो  दानिशवर  परिंदों  की  ज़ुबां  को  जानते  हैं
यक़ीनन  वो   तिलिस्मे-आसमां    को  जानते  हैं

तू  कहता  रह  कि  तू  ख़ुद्दार  है  झुकता  नहीं  है
मगर   हम  भी   तेरे   हर  मेह्रबां    को  जानते  हैं

वही     बातें      वही     वादे     वही     बेरोज़गारी
वतन  के   नौजवां   सब  रहनुमां  को    जानते  हैं

कहां  नीयत  कहां  नज़रें  कहां  मंज़िल  सफ़र  की
सभी   रस्ते     अमीरे-कारवां      को    जानते  हैं

खिलेंगे  ख़ुद-ब-ख़ुद  दिल  में  किसी  दिन  आपके  भी
गुलो-ग़ुञ्चे   मुहब्बत  के    निशां     को   जानते  हैं

कहीं  ये  आ  गए  ज़िद  पर  तो  दुनिया  को  डुबो  दें
तेरे   लश्कर    मेरे  अश्के-रवां     को    जानते  हैं

तेरे  अहकाम  पर    चलती  नहीं    मख़लूक़  तेरी
इलाही !  हम    तेरे  दर्दे-निहां    को     जानते  हैं  !

                                                                                                     (2017)

                                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दानिशवर : विद्वत्जन; परिंदों : पक्षियों; ज़ुबां : भाषा; यक़ीनन : निश्चय ही; तिलिस्मे-आसमां : आकाश/ईश्वर का रहस्य; ख़ुद्दार : स्वाभिमानी; मेह्रबां : कृपा करने वाले; रहनुमां : नेता गण; अमीरे-कारवां : यात्री दल का प्रमुख; ख़ुद-ब-ख़ुद : स्वयंमेव; गुलो-ग़ुञ्चे : पुष्प एवं कलियां; निशां : चिह्न; लश्कर : सैन्य-दल; अश्के-रवां : बहते आंसू; अहकाम : आदेशों; मख़लूक़ : सृष्टि; इलाही : ईश्वर; दर्दे-निहां : गुप्त पीड़ा ।


मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

...धार रखते हैं !

आप  पर  एतबार  रखते  हैं
हम  युं  ही  जी  को  मार  रखते  हैं

चोट  खाना  नसीब  है  अपना
हसरतें  तो  हज़ार  रखते  हैं

कौन  जाने  कि  क्या  पिला  डालें
जो  नज़र  में  ख़ुमार  रखते  हैं

राज़े-सेहत  बताएं  क्या  अपना
दर्द  दिल  पर  सवार  रखते  हैं

काटिए  क्या  हुज़ूर  ख़ंजर  से
हम  अभी  सर  उतार  रखते  हैं

बाज़  आएं  नज़र  मिलाने  से
हम  बहुत  तेज़  धार  रखते  हैं

कौन  हमको  वफ़ा  सिखाएगा
हम  जिगर  तार-तार  रखते  हैं

दीजिए  बद्दुआ  हमें  खुल  कर
हम  सभी  कुछ  उधार  रखते  हैं

मौत  आई  है  जायज़ा  लेने
दुश्मनों  को  पुकार  रखते  हैं !

                                                                   (2017)

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: एतबार: विश्वास; नसीब: प्रारब्ध; हसरतें: लालसाएं; ख़ुमार: मदिरता; राज़े-सेहत: स्वास्थ्य का रहस्य; ख़ंजर: क्षुरि; बाज़  आना : दूर रहना; बद्दुआ: अशुभकामना; जायज़ा : पर्यवेक्षण।


सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

हम चराग़े-वफ़ा...

क़ैदे-ज़िन्दां-ए-उम्मीद  में  मिट  गए
हम  मुहब्बत  की  ताईद  में  मिट  गए

चंद  जज़्बात  उन  पर  खुले  ही  नहीं
चंद  अश्'आर  तन्क़ीद  में  मिट  गए

थे  मुनव्वर  कई  नाम  तारीख़  में
शाह  की  मश्क़े-तज्दीद  में  मिट  गए

ढूंढते  हैं  निशानात  तहज़ीब  के
जो  जहालत  की तह् मीद  में  मिट   गए

उम्र  भर  जो  हवस  में  भटकते  रहे
वो  फ़क़ीरों  की  तक़लीद  में  मिट  गए

हम  चराग़े-वफ़ा  थे  अज़ल  तक  जिए
क़ुमक़ुमे  रश्क़े-ख़ुर्शीद  में  मिट  गए

लोग  शिर्के-जली  में  वली  हो  गए
और  हम  फ़िक्रे-तौहीद  में  मिट  गए  !

                                                                           (2017)

                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: क़ैदे-ज़िन्दां-ए-उम्मीद : आशा के कारागार का बंधन; ताईद : अनुमोदन, पक्षधरता; जज़्बात : भावनाएं; अश्'आर: (अनेक) शे'र, शे'र का बहुवचन; तन्क़ीद : टीका-टिप्पणी, आलोचना; मुनव्वर : प्रकाशवान, उज्ज्वल; तारीख़ : इतिहास; मश्क़े-तज्दीद : नवीनीकरण के प्रयास; निशानात : चिह्न (बहु.); तहज़ीब : सभ्यता; जहालत : अज्ञान, जड़ता; तह् मीद : प्रशंसा; हवस : वासना, लोभ; फ़क़ीरों : संतों, सिद्ध जन; तक़लीद : अनुकरण; चराग़े-वफ़ा : आस्था-दीप; अज़ल : प्रलय, नई सृष्टि का आरंभ; क़ुमक़ुमे : कृत्रिम, दिखावटी दीपक; रश्क़े-ख़ुर्शीद : सूर्य से ईर्ष्या; शिर्के-जली : जान-बूझ कर की जाने वाली व्यक्ति-पूजा, चापलूसी; फ़िक्रे-तौहीद: अद्वैत-चिंतन।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

शिफ़ा ज़रूरी है !

मुफ़लिसी  में  अना  ज़रूरी  है
दोस्तों  की    दुआ    ज़रूरी  है

इश्क़  से  डर  हमें  नहीं  लगता
गो  मुआफ़िक़  हवा  ज़रूरी  है

आप  तड़पाएं  या  तसल्ली   दें
दर्दे-दिल  में  शिफ़ा  ज़रूरी  है

शौक़  रखिए  तबाह  करने  का
पर  कहीं  तो  वफ़ा  ज़रूरी  है

बात  दिल  की  हो  या  ज़माने  की
साफ़  हो    मुद्द'आ   ज़रूरी  है

जुर्म  कब  तक  छुपाए  रखिएगा
आख़िरत  में  सज़ा  ज़रूरी  है

मुर्शिदों  का   मयार   पाने   को
क्या    फ़रेबे-ख़ुदा   ज़रूरी  है ?

                                                               (2017)

                                                         -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ : मुफ़लिसी : निर्धनता; अना : स्वाभिमान; गो : यद्यपि; मुआफ़िक़ : स्वभावानुकूल; तसल्ली : सांत्वना; शिफ़ा : रोग-मुक्ति; मुद्द'आ : उचित विषय; जुर्म : अपराध; आख़िरत : परलोक, अंतिम परिणाम; मुर्शिदों : सिद्ध संतों; मयार : स्तर ।


गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

देते हो धोखा ...

देते  हो  धोखा  महफ़िल  में
क्या  शर्म  नहीं  बाक़ी  दिल  में

ज़ंग-आलूदा  हैं  सब  छुरियां
वो  बात  नहीं  अब  क़ातिल  में

मुस्तैद  रखो  फ़र्ज़ी  अपना
है  शाह  तुम्हारा  मुश्किल  में

हम  सज्दा  करते  जाते  हैं
तुम  रंज़िश  रखते  हो  दिल  में

शम्'.अ  हमसे  कह  कर  देखे
हम  आग  लगा  दें  महफ़िल  में

तूफ़ां  तो  सिर्फ़  दिखावा  है
गिर्दाब  छुपे  हैं  साहिल  में

माज़ी  को  आग  लगा  आए
देखें  क्या  है  मुस्तक़्बिल  में  !

                                                        (2017)

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: महफ़िल : सभा; ज़ंग-आलूदा : ज़ंग लगी हुई, क्षरित; मुस्तैद: सन्नद्ध; फ़र्ज़ी : शतरंज के खेल का सबसे शक्तिशाली मोहरा, वज़ीर; सज्दा:आपादमस्तक प्रणाम; रंज़िश: वैमनस्य; तूफ़ां: झंझावात; गिर्दाब: भंवर, जलावर्त्त; साहिल: तट; माज़ी : अतीत; मुस्तक़्बिल : भविष्य ।


बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

दर्दे-दिल के अफ़्आल ...

सल्तनत   के  ज़वाल  की  आहें
ज़र्द    जाहो-जलाल    की  आहें

मांगती  हैं  हिसाब  वहशत  का
हर  सुलगते   सवाल  की  आहें

लफ़्ज़  शायद  बयां  न  कर  पाएं
नर्मो-नाज़ुक़  ख़्याल  की  आहें

पढ़  रही  हैं  मिज़ाज  यारों  का
मुफ़्लिसे-ख़स्त:हाल   की  आहें

आप  सहते  तो  याद  भी  रखते
हिज्र  के  माहो-साल  की  आहें

क़ैदे-सफ़्हात    में   तड़पती  हैं
दर्दे-दिल  के अफ़्आल  की  आहें

काश !  हमदर्द  कोई  गिन  पाता
इस  दिले-बेमिसाल   की   आहें !

                                                             (2017)

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: सल्तनत : राज; ज़वाल: पतन; ज़र्द: निस्तेज; जाहो-जलाल: तेज-प्रताप; वहशत: भयानक व्यवहार; लफ़्ज़; शब्द; बयां; व्यक्त; नर्मो-नाज़ुक़; कोमल एवं मृदुल; मिज़ाज; तबीयत; हिज्र: वियोग; माहो-साल; महीने एवं वर्ष; क़ैदे-सफ़्आत : पृष्ठों में बंदी; अफ़्आल: रचना-संग्रह; हमदर्द; पीड़ा में सहभागी, सहानुभूतिशील; दिले-बेमिसाल; अप्रतिम हृदय ।