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सोमवार, 18 सितंबर 2017

सज़ा के मुस्तहक़...

मोम  के  हैं  पर  हमारे  और  जलता  आस्मां
कोशिशे-परवाज़  पर  आतिश  उगलता  आस्मां

हम  अगर  मज़्लूम  हैं  तो  भी  सज़ा  के  मुस्तहक़
ख़ुद   हज़ारों  जुर्म  करके  बच  निकलता  आस्मां

सौ  बरस  की  राह  में  नव्वे  बरस  के  इम्तिहां
हर  सफ़र  में  दुश्मनों  के  साथ  चलता  आस्मां

है  करम  उसका  फ़क़त  सरमाएदारों  के  लिए
मुफ़लिसों  के  रिज़्क़  पर  हर  वक़्त  पलता  आस्मां

रोज़  हम  उम्मीद  करते  हैं  किसी  के  फ़ज़्ल  की
रोज़-ो-शब  मुंह   पर  हमारे  ख़ाक   मलता  आस्मां

मोमिनों  के  सामने  भी  झूठ  बोले  गर  ख़ुदा 
गिर   पड़ेगा  एक  दिन  पल  पल  पिघलता  आस्मां

और  तो  कुछ  दे  न  पाया  मांगने  पर  भी  हमें
मग़फ़िरत  की  बात  पर  फ़ित्रत  बदलता  आस्मां  !

                                                                                      (2017)

                                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: पर: पंख; आस्मां: आकाश, नियति, ईश्वर, इत्यादि; कोशिशे-परवाज़: उड़ान के प्रयत्न; आतिश: अग्नि; मज़्लूम:अत्याचार-पीड़ित; सज़ा:दंड; मुस्तहक़:पात्र,अधिकारी; जुर्म:अपराध; नव्वे:नब्बे; इम्तिहां:परीक्षाएं; करम:दया,कृपा; फ़क़त:मात्र; सरमाएदारों: संमृद्ध,पूंजीपतियों; मुफ़लिसों: वंचित,निर्धनों; रिज़्क़: जीवनयापन के साधन,भोजन; फ़ज़्ल:कृपा,महानता,दानशीलता; ख़ाक: धूल,मिट्टी, राख़; मोमिनों: आस्तिकों,भक्तजनों; मग़फ़िरत:मोक्ष; फ़ित्रत:स्वभाव,प्रकृति। 




सोमवार, 11 सितंबर 2017

सुर्ख़ परचम के लिए...

साफ़  मौसम  के  लिए  कुछ  कीजिए
ज़ुल्फ़  के  ख़म  के  लिए  कुछ  कीजिए

दुश्मनों  पर  सर्फ़  करते  हो  वफ़ा
काश ! हमदम  के  लिए  कुछ  कीजिए

ताक़यामत  तोड़ना  मुमकिन  न  हो
उन  मरासिम  के  लिए  कुछ  कीजिए

दर्द  हो  थोड़ा-बहुत  तो  झेल  लें
शिद्दते-ग़म  के  लिए  कुछ  कीजिए

ज़ख़्म  देने  थे  जिन्हें  वो:  दे  चुके
आप  मरहम  के  लिए  कुछ  कीजिए

ज़र्द  क्यूं  हो  बाग़ियों  का  हौसला
सुर्ख़  परचम  के  लिए  कुछ  कीजिए

मौत  घर  के  सामने  तक  आ  गई
ख़ैर  मक़दम  के  लिए  कुछ  कीजिए  !

                                                                         (2017)

                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: ज़ुल्फ़  के  ख़म : लटों का घुंघरालापन ; सर्फ़ : व्यय; वफ़ा : आस्था; काश : अच्छा हो यदि; हमदम : अंत तक साथ निभाने वाले ; ताक़यामत : प्रलय होने तक : मुमकिन : संभव ; मरासिम : स्नेह संबंधों ; शिद्दते-ग़म : दु:ख की तीव्रता ; ज़ख़्म : घाव ; ज़र्द : पीला, मलिन; बाग़ियों : विद्रोहियों;  हौसला : उत्साह; सुर्ख़  परचम : लाल ध्वजा ; ख़ैर  मक़दम : स्वागत l



शनिवार, 19 अगस्त 2017

एहसां जताने लगे...

ज़रा-से  करम  को  ज़माने  लगे
ख़ुदा  रोज़   एहसां   जताने  लगे

नज़र  में   न  थे  तो   परेशां  रहे
नज़र  में  लिया  तो  सताने  लगे

संवरना  हमीं  ने  सिखाया  उन्हें
हमीं  को   अदाएं   सिखाने  लगे

इसे  रहज़नी  के  सिवा  क्या  कहें
कि  दिल  छीन  कर  खिलखिलाने  लगे

तबीबे-मुहब्बत   चुना  था  जिन्हें
उन्हें  ज़ख्मे-दिल  भी  बहाने  लगे 

निगाहें  बचा  कर  निकल  जाएंगे
अगर  हम   उन्हें   आज़माने  लगे

बहुत  रोएंगे    याद  करके    हमें
जिन्हें  उम्र  भर  हम  दिवाने  लगे  

बुरा  वक़्त  है     रौशनी  के  लिए
कि  ज़र्रे  भी  जल्वा  दिखाने  लगे

न  साहिल  मिले  तो  भंवर  ही  सही
सफ़ीना  कहीं  तो  ठिकाने  लगे  !

                                                                       (2017)

                                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: करम: कृपा; ज़माने: युगों; एहसां: अनुग्रह; अदाएं: भंगिमाएं; रहज़नी: मार्ग में लूट-मार; तबीबे-मुहब्बत: प्रेम का उपचार करने वाला; ज़ख्मे-दिल: हृदय के घाव; रौशनी: प्रकाश, विवेक; ज़र्रे: सूक्ष्म कण; जल्वा: ईश्वर की भांति प्रकट होना; साहिल: तट; सफ़ीना: नौका। 



बुधवार, 16 अगस्त 2017

पास बेक़रारों का ...

क़त्ल  करके  हसीं  बहारों  का
तन  गया  सर  रसूख़दारों  का

लाशे-अत्फ़ाल  रौंद  कर  ख़ुश  हैं
तुफ़ ! ये:  किरदार  ताजदारों  का

मुंह  छुपा  लें  कि  सर  कटा  डालें
है  पसोपेश  शर्मसारों  का

है  हमारी  कमी  कि  क़ायम  है
दबदबा  ज़ुल्म  के  इदारों  का

जल  न  जाए  ज़मीन  जन्नत  की
ख़ूं  बहुत   बह  चुका   चिनारों  का

जब्र  की  इंतिहा  अगर  होगी
सब्र  चुक  जाएगा  क़तारों  का

वो:  फ़रिश्तों  के  हुस्न  में  गुम  हैं
है  हमें  पास  बेक़रारों  का

इश्क़  ही  आख़िरी  मुदावा   है
रूह  पर  पड़  गई  दरारों  का !

                                                                       (2017)

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: क़त्ल: हत्या; हसीं: सुंदर; बहारों: बसंतों; सर: शीश; रसूख़दारों: प्रभावशाली लोगों; लाशे-अत्फ़ाल: शिशुओं के शव;  तुफ़: धिक्कार है; किरदार: चरित्र; ताजदारों: मुकुटधारियों, सत्ताधीशों; पसोपेश: दुविधा; शर्मसारों: लज्जित समूहों; क़ायम: शेष, स्थापित; दबदबा: प्रभुत्व; :ज़ुल्म: अत्याचार; इदारों: संस्थानों; जन्नत: स्वर्ग; चिनारों: कश्मीर घाटी में  पाया जाने वाला एक सुंदर वृक्ष; जब्र: अन्याय, बल का अनुचित प्रयोग; इंतिहा: अति; सब्र: धैर्य; क़तारों: पंक्तियों; फ़रिश्तों: देवदूतों (के समान व्यक्तियों); हुस्न: सौंदर्य; गुम: खोए हुए; पास: चिंता, पक्षधरता, ध्यान; बेक़रारों: व्यग्र व्यक्तियों; इश्क़: असीम प्रेम; मुदावा: उपचार; रूह: आत्मा; दरारों: संधियों।  

सोमवार, 10 जुलाई 2017

...फिर नमी होगी

मेरे  अल्फ़ाज़  मुझसे  रूठ  कर  कुछ  दूर  बैठे  हैं
कि  जैसे  वक़्त  के  हाथों  सनम  मजबूर  बैठे  हैं

करें  किससे  शिकायत  दोस्तों  की  बेनियाज़ी  की
वफ़ा  के  दफ़्तरों  में  भी  तन-ए-रंजूर  बैठे  हैं

किसी  दिन  फिर  नमी  होगी  निगाहों  में  मेह्रबां  की
दुआ  लेकर  दरे-मेहबूब  पर  मशकूर  बैठे  हैं

अजब  तस्वीर  है  इस  दौर  में  बाग़े-सियासत  की
इधर  अमरूद  कच्चे  हैं  उधर  लंगूर  बैठे  हैं

मदारी  मस्त  है  सरमाएदारों  से  गले  मिल  कर
नज़र  जाती  नहीं  उसकी  जिधर  मज़दूर  बैठे  हैं

हमारा  मर्तबा  छोड़ो  हमारा  सिलसिला  देखो
हमारे      चाहने  वाले       रहे-मंसूर     बैठे  हैं

उतर  आए  ज़मीं  पर  हम  ख़ुदा  को  छोड़  कर  जबसे
सितारे  आसमां  पर  आज  तक  बे-नूर  बैठे  हैं  !
 
                                                                                                (2017)

                                                                                          -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: अल्फ़ाज़: शब्द (बहु.); सनम: प्रिय; मजबूर: विवश; बेनियाज़ी: निर्मोह, निर्ममता; वफ़ा: आस्था; तन-ए-रंजूर: रोगी, अस्वस्थ शरीर वाले; नमी: गीलापन, संवेदना; मेह्रबां: कृपालु; दुआ: प्रार्थना; दरे-महबूब: प्रिय का द्वार; मशकूर: आभारी; तस्वीर: परिदृश्य; बाग़े-सियासत: राजनीति का उद्यान; मदारी: मायावी, मायाजाल फैलाने वाला; मस्त: मदोन्मत्त; सरमाएदारों: पूंजीपतियों; नज़र: दृष्टि; मज़दूर: श्रमिक; मर्तबा: सामाजिक स्थान, वर्ग; सिलसिला: वंशानुक्रम; रहे-मंसूर: हज़रत मंसूर अ.स. के मार्ग पर, बलिदान के मार्ग पर; ज़मीं: पृथ्वी, संसार; सितारे: नक्षत्र; आसमां: आकाश; बे-नूर: निराभ्र, प्रकाशहीन। 








शनिवार, 8 जुलाई 2017

एक उम्मीदे-शिफ़ा ...

चंद  अश्'आर  जो  सीने  में  दबा  रक्खे  हैं
कुछ  समझ-सोच  के  यारों  से  छुपा  रक्खे  हैं

एक  उम्मीदे-शिफ़ा  ये  है  कि  वो  आ  जाएं
इसलिए  मर्ज़  तबीबों  से  बचा  रक्खे  हैं

हो  अगर  दिल  में  शरारत  तो  बता  दें  हमको
वर्न:  हमने  भी  कई  दांव  लगा  रक्खे  हैं

वर्क़  दर  वर्क़  बयाज़ों  का   मुताला  कर  लें
किस  क़दर  आपने  एहसान  भुला  रक्खे  हैं

सब्र  रखने  की  वजह  हो  तो  ख़ुशी  से  रख  लें
आपने  यूं  भी  बहुत  तीर  चला  रक्खे  हैं

घर  हमारा  जो  जला  है  तो  समझ  लें  वो  भी
चश्मदीदों  ने  कई  राज़  बता  रक्खे  हैं

अर्श  जिस  रोज़  पुकारेगा  निकल  जाएंगे
क़र्ज़  कब  हमने  ज़माने  के  उठा  रक्खे  हैं ?

                                                                                        (2017)

                                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: चंद: कुछ; अश्'आर: शे'र (बहु.); उम्मीदे-शिफ़ा: रोग-मुक्ति/आरोग्य की आशा; तबीबों: उपचारकों, वैद्यों/हकीमों; वर्न:: अन्यथा; वर्क़ दर वर्क़: पृष्ठ प्रति पृष्ठ; बयाज़ों: दैनन्दिनियों; मुताला: पठन; एहसान: अनुग्रह; सब्र: धैर्य; चश्मदीदों: प्रत्यक्षदर्शी; राज़: रहस्य; अर्श: आकाश, ईश्वर; क़र्ज़: ऋण।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

रहम नहीं आता ...

आज  ख़ामोश  रहें  भी  तो  क्या
और  दिल  खोल  कर  कहें  भी  तो  क्या ?

आपको  तो  रहम  नहीं  आता
हम  अगर  दर्द  सहें  तो  भी  क्या

क़त्ल  करके  हुज़ूर  हंसते  हैं
भीड़  में  अश्क  बहें  भी  तो  क्या

ज़ुल्म  तारीख़  में  जगह  लेंगे
शाह  के  क़स्र  ढहें  भी  तो  क्या

मौत  हदिया  वसूल  कर  लेगी
क़ैद  में  ज़ीस्त  की  रहें  भी  तो  क्या  ?

                                                                              (2017)

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: रहम: दया; हुज़ूर: श्रीमान; अश्क: आंसू; ज़ुल्म: अत्याचार; क़स्र: महल; क़ैद: बंधन; ज़ीस्त: जीवन। 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

आशिक़ों की अमां...

न  दिल  चाहते  हैं  न  जां  चाहते  हैं
फ़क़त  आशिक़ों  की  अमां   चाहते  हैं

उड़ानों  पे  बंदिश  न  पहरा  सुरों  पर
परिंदे    खुला  आस्मां   चाहते  हैं

मुरीदे-शहंशाह  हद  से  गुज़र  कर
रिआया  के  दोनों  जहां  चाहते  हैं

क़फ़न  खेंच  कर  लाश  से  वो  हमारी
बदन  पर  वफ़ा  के  निशां  चाहते  हैं

उमीदे-रहम  आपसे  क्या  करें  हम
सितम  भीड़  के  दरमियां  चाहते  हैं

हमारे  लिए  गोश:-ए-दिल  बहुत  है
कहां  तख़्ते-हिन्दोस्तां  चाहते  हैं

ख़ुदा  मान  ले  शर्त्त  तो  चल  पड़ें  हम
कि  क़द  के  मुताबिक़  मकां  चाहते  हैं  !

                                                                          (2017)

                                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : जां: प्राण; फ़क़त: मात्र; आशिक़ों: प्रेमियों; अमां: सुरक्षा; बंदिश: प्रतिबंध; परिंदे: पक्षीगण; आस्मां: आकाश; मुरीदे-शहंशाह: शासक के प्रशंसक/भक्त जन; हद: सीमा; रिआया: नागरिक गण; दोनों जहां: दोनों लोक, इहलोक-परलोक; क़फ़न: शवावरण; बदन: शरीर; वफ़ा: आस्था; निशां: चिह्न; उमीदे-रहम: दया की आशा; सितम: अत्याचार; दरमियां: मध्य; गोश:-ए-दिल: हृदय का कोना; तख़्ते-हिन्दोस्तां: भारत का सिंहासन; शर्त्त: दांव; क़द: आकार; मुताबिक़: अनुसार; मकां: आवास, समाधि। 

गुरुवार, 29 जून 2017

रग़ों में ज़हर...

किधर  ढूंढिएगा  कहां  खो  गया
मियां  मान  लीजे  कि  दिल  तो  गया

उसे  तिश्नगी  ने  न  बख़्शा  कभी
अकेला  ख़राबात  में  जो  गया

गुलों  को  न  अब  कोई  इल्ज़ाम  दे
कि  मौसम  रग़ों  में  ज़हर  बो  गया

मदारी  बना  शाह  जिस  रोज़  से
हक़ीक़त  से  क़िस्सा  बड़ा   गया

लबे-चश्म  सैलाब  घुटता  रहा
मगर  दाग़  दिल  के  सभी  धो  गया

किसे  हौसला  दें  किसे  बद्दुआ
कि  क़ातिल  मेरी  क़ब्र  पर  रो  गया

शबे-वस्ल  का  ज़िक्र  मत  छेड़िए
रहे  जागते  हम  ख़ुदा  सो  गया  !

                                                                                         (2017)

                                                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तिश्नगी: सुधा; बख़्शा: छोड़ा; ख़राबात: मदिरालय; गुलों: फूलों; इल्ज़ाम: दोष, आरोप; रग़ों: शिराओं; मदारी: इंद्रजाल के खेल दिखाने वाला; हक़ीक़त: यथार्थ; क़िस्सा: आख्यान; लबे-चश्म: आंख की कोर पर; सैलाब: बाढ़; दाग़: कलंक; हौसला: सांत्वना; बद्दुआ: अशुभकामना; क़ातिल: हत्यारा; क़ब्र: समाधि; शबे-वस्ल: मिलन की निशा; ज़िक्र: उल्लेख। 
 


मंगलवार, 27 जून 2017

मौत को इश्क़...

जब  जहालत  गुनाह  करती  है
सल्तनत  वाह  वाह  करती  है

आइन-ए-मुल्क  में  बहुत  कुछ  है
क्या  सियासत  निबाह  करती  है

सल्तनत  चार  दिन  नहीं  चलती
जो  सितम  बेपनाह  करती  है

अस्लहे  वो:  असर  नहीं  करते
जो  वफ़ा  की  निगाह  करती  है

आशिक़ी  में  अना  कभी  दिल  को
तो  कभी  घर  तबाह  करती  है

ख़ुर्दबीं  है  नज़र  मुरीदों  की
ख़ाक  को  मेह्रो-माह  करती  है

मौत  को  इश्क़  हो  गया  हमसे
मुख़बिरों  से  सलाह  करती  है  !

                                                                      (2017)

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: जहालत: बुद्धिहीनता; सल्तनत: साम्राज्य; आइन-ए-मुल्क: देश का संविधान; सियासत: राजनीति; निबाह: निर्वाह; सितम: अत्याचार; बेपनाह: अत्यधिक, सीमाहीन; अस्लहे: अस्त्र-शस्त्र; वफ़ा: आस्था; अना: अहंकार; तबाह: ध्वस्त; ख़ुर्दबीं: सूक्ष्मदर्शी; नज़र: दृष्टि; मुरीदों: भक्तजन, प्रशंसक; ख़ाक: धूल; मेह्रो-माह: सूर्य और चंद्र; मुख़बिरों: समाचार देने वाले, गुप्तचर। 

सोमवार, 26 जून 2017

वफ़ा के सताए...

ईद  में  मुंह  छुपाए  फिरते  हैं
ग़म  गले  से  लगाए  फिरते  हैं

दुश्मनों  के  हिजाब  के  सदक़े
रोज़  नज़रें  चुराए   फिरते  हैं

दिलजले  हैं  बहार  के  आशिक़
तितलियों  को  उड़ाए  फिरते  हैं

कोई  उनको  पनाह  में  ले  ले
जो  वफ़ा  के  सताए  फिरते  हैं

टोपियां  हैं  गवाह  ज़ुल्मों  की
किस  तरह  सर  बचाए  फिरते  हैं

शुक्र  है  हम  अदीब  सीने  में
दर्दे-दुनिया   दबाए  फिरते  हैं

शाह  हैं  ऐश  हैं  रक़ीबों   के
और  हम  जां  जलाए  फिरते  हैं  !

                                                                     (2017) 

                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हिजाब: मुखावरण; सदक़े: बलिहारी; दिलजले: विदग्ध हृदय; आशिक़: प्रेमी; पनाह: शरण; वफ़ा: आस्था; गवाह: साक्षी; 
ज़ुल्मों: अत्याचारों; अदीब: रचनाकार, साहित्यकार; दर्दे-दुनिया: संसार भर की पीड़ा; ऐश: विलासिता; रक़ीबों: शत्रुओं; जां: प्राण, हृदय। 

बुधवार, 21 जून 2017

एक दिन मुक़र्रर हो...

शौक़  तो  उन्हें  भी  है  पास  में  बिठाने  का
जो  हुनर  नहीं  रखते  दूरियां   मिटाने  का

रोज़  रोज़  क्यूं  हम  भी  आपसे  पशेमां  हों
एक  दिन  मुक़र्रर  हो  रूठने-मनाने  का

आपकी  सफ़ाई  से  मुत्मईं  नहीं  हैं  हम
राज़  कोई  तो  होगा  आपके  न  आने  का

कस्रते-सियासत  हैं  दीनो-धर्म  के  झगड़े
ख़त्म   सिलसिला  कीजे  बस्तियां  जलाने  का

ख़ुदकुशी  के  सौ  सामां  शाह  ने  सजा  डाले
फ़र्ज़  अब  हमारा  है  मुल्क  को  बचाने  का

क्या  ख़बर  कि  दीवाने  कब-किसे  ख़ुदा  कर  लें
मर्ज़  है  मुरीदों  को  जूतियां  उठाने  का

जानते  नहीं  क्या  हम   आपकी  अदाओं  को
याद  बस  बहाना  है   अर्श  पर  बुलाने  का  !

                                                                                          (2017)

                                                                                    - सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हुनर: कौशल, पशेमां: लज्जित; मुक़र्रर: निश्चित; सफ़ाई: स्पष्टीकरण; मुत्मईं: संतुष्ट;  :रहस्य; कस्रते-सियासत: राजनीतिक उठा-पटक; सिलसिला: क्रम, चलन; ख़ुदकुशी: आत्म-हत्या; सामां: सामग्रियां; फ़र्ज़: ;कर्त्तव्य; मुल्क: देश; दीवाने: उन्मत्त जन; मर्ज़: रोग; मुरीदों: भक्त जन;  अदाओं: भंगिमाओं; अर्श: आकाश।  

शनिवार, 17 जून 2017

लबों पर तबस्सुम ...

सितम  कीजिए  या   दग़ा  कीजिए
ख़ुदा  के  लिए  ख़ुश  रहा  कीजिए

दुआ  है  फ़रिश्ते  मिलें   आपको
न  हो  तो  हमीं  से  वफ़ा  कीजिए

बुरे  वक़्त  में   बेहतरी  के  लिए
लबों  पर  तबस्सुम  रखा  कीजिए

सितारे  पहुंच  से  अगर  दूर  हैं
तो  किरदार  अपना  बड़ा  कीजिए

फ़क़ीरो-शहंशाह  सब  एक  हैं
निगाहें  उठा  कर  जिया  कीजिए

न  बदलेंगे  मस्लक  किसी  हाल  में
मुरीदों  से  लिखवा  लिया  कीजिए

ज़रूरी  नहीं  आप  सज्दा  करें
सलामो-दुआ  तो  किया  कीजिए  !

                                                                     (2017)

                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: सितम: अत्याचार; दग़ा: छल;फ़रिश्ते :देवदूत;वफ़ा :निर्वाह; बेहतरी : उत्तमता; लबों : होठों; तबस्सुम : मुस्कान ; किरदार :व्यक्तित्व,चरित्र;मस्लक:पंथ;मुरीदों :भक्तजन,अनुयायी; सज्दा :साष्टांग प्रणाम;सलामो-दुआ :नमस्कार एवं शुभेच्छा।  

शनिवार, 10 जून 2017

क़ब्र की राह...

आज  मौसम  हमारा  नहीं  क्या  करें
दोस्तों  से  गुज़ारा  नहीं  क्या  करें

ज़ीस्त  ने  तो  हमें  ग़म  दिए  ही  दिए
मौत  से  भी  सहारा  नहीं  क्या  करें

तीरगी  को  मिटाना  हंसी-खेल  है
पर  शम्'.अ  का  इशारा  नहीं  क्या  करें

हर  क़दम  पर  मसाजिद  मिलेंगी  मगर
आशिक़ी  का  इदारा  नहीं  क्या  करें

जिसने  किरदार  खेला  कभी  शाह  का
फिर  मुखौटा  उतारा  नहीं  क्या  करें

रिंद  को  क़ब्र  की  राह  मंज़ूर  है
शैख़  का  घर  गवारा  नहीं  क्या  करें

आप  भी  दूर  ही  दूर  बैठे  रहे
अर्श  ने  भी  पुकारा  नहीं  क्या  करें !

                                                                                  (2017)

                                                                           -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: गुज़ारा: निर्वाह; ज़ीस्त: जीवन; तीरगी: अंधकार; शम्'.अ: दीपिका; इशारा: संकेत; मसाजिद : मस्जिदें; आशिक़ी : प्रेम; 
इदारा : संस्थान ; किरदार: पात्र, चरित्र; रिंद : पियक्कड़; क़ब्र : समाधि; शैख़: धर्म-भीरु; गवारा : स्वीकार।  





बुधवार, 7 जून 2017

ज़िक्र सदमात का ...

इबादत  न  कीजे  किसी  शाह  की
दग़ाबाज़     मक्कार    गुमराह  की

न  जाने    कहां   ले  गिरे    रहनुमा
हक़ीक़त    समझिए   नई  राह  की

किसे  दोस्त  समझें  किसे  मुस्तफ़ा
हमारी   किसी  ने   न   परवाह  की

जहां    पीर  ही  पीर  हों    बज़्म  में
वहां  क्या  ज़रूरत  है  इस्लाह  की

न  कीजे  कभी  ज़िक्र  सदमात  का
तबीयत बिगड़ती है  ख़ुश ख़्वाह  की

बहुत  तेज़  हैं    आंधियां   ज़ुल्म  की
कहीं  लौ  न  बुझ  जाए  मिस्बाह  की

ग़ज़ल   याद  रखिए  न  रखिए   मेरी
मगर   कीजिए   फ़िक्र   दरगाह  की  !

                                                                                 (2017)

                                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: इबादत : पूजा; दग़ाबाज़: विश्वासघाती; मक्कार: छल करने वाला; गुमराह: मार्गच्युत; मुस्तफ़ा: धर्मगुरु; 
रहनुमा: मार्गदर्शक; हक़ीक़त:वास्तविकता,यथार्थ; पीर:गुरु; बज़्म:सभा, जमावड़ा; इस्लाह:त्रुटि-सुधार,संशोधन; 
सदमात: आघात; ख़ुशख़्वाह: शुभचिंतक; ज़ुल्म: अत्याचार; मिस्बाह: दीपक; दरगाह : समाधि। 

मंगलवार, 6 जून 2017

कितना ख़ूं, कितना पानी...

वैसे  तो  दुनिया  फ़ानी  है
सच  के  साथ  परेशानी  है

ख़ुद्दारों  पर  दाग़  लगाना
मग़रूरों  की  नादानी  है

शाहों  से  डर  जाने  वालो
यह  रुत  भी  आनी-जानी  है

संगीनों  पर  चल  कर  जीना
ज़िद  अपनी  जानी-मानी  है

अब  जम्हूर  कहां  रक्खा  है
सरकारों  की  मनमानी  है

रैयत  उतरी  है  सड़कों  पर
हाकिम  को  क्यूं  हैरानी  है

हम  भी  देखें  किन  आंखों  में
कितना  ख़ूं  कितना  पानी  है  !

                                                                           (2017)

                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: फ़ानी : नश्वर; ख़ुद्दारों : स्वाभिमानियों; दाग़ : दोष; मग़रूरों : घमंडियों, अहंकारियों; नादानी : अज्ञान; जम्हूर : लोकतंत्र; रैयत : नागरिक गण; हाकिम : आदेश देने वाला, शासक; ख़ूं। 

शुक्रवार, 2 जून 2017

नौजवां लुट गया ...

तलाशे-मकां  में  जहां  लुट  गया
ज़मीं  के  लिए  आस्मां  लुट  गया

अदा  सादगी  शोख़ियां  पैरहन
न  जाने  दिवाना  कहां  लुट  गया

पसोपेश  में  रह  गईं  आंधियां
सफ़ीना  इसी  दरमियां  लुट  गया

मिला  शाह  हमको  ख़ुदादाद  ख़ां
कि  सदक़े  में  हर  नौजवां  लुट  गया

रिआया  तरसती  रही  रिज़्क़  को
सियासत  में  हिन्दोस्तां  लुट  गया

कहीं  तीरगी  को  ख़ुदा  मिल  गया
कहीं  रौशनी   का  मकां  लुट  गया

रहे-मग़फ़िरत  पर  चले  थे  मगर
मेरे  पीर  का  कारवां  लुट  गया  !

                                                                      (2017)

                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तलाशे-मकां : घर की खोज; जहां: संसार, गृहस्थी; ज़मीं: पृथ्वी, इहलोक; आस्मां : आकाश, परलोक; अदा: भाव-भंगिमा; 
सादगी: सहजता, ऋजुता; शोख़ियां: चंचलता; पैरहन: वस्त्र-विन्यास; पसोपेश: दुविधा; सफ़ीना: नौका, जलयान; दरमियां: बीच, मध्य; ख़ुदादाद: ईश्वर दत्त, ईश्वर की देन; सदक़े: बलिहारी; रिआया: नागरिक गण; रिज़्क़: भोजन; सियासत: राजनीति; तीरगी: अंधकार; रौशनी: प्रकाश; रहे-मग़फ़िरत: मोक्ष का मार्ग; पीर: मार्गदर्शक, मनुष्य और ईश्वर का मध्यस्थ, आध्यात्मिक गुरु; कारवां: यात्री-दल।  

शनिवार, 27 मई 2017

रिंद की ज़िंदगी...

फंस  गए  शैख़  पहली  मुलाक़ात  में
सर-ब-सज्दा    पड़े  हैं   ख़राबात  में

ठीक  है  मैकदा  घर  ख़ुदा  का  नहीं
क्या  बुरा  है   यहां  भी  मुनाजात   में

शाह  मदहोश  है  तख़्त  के  ज़ो'म  में
और  लश्कर    लगे  हैं   ख़ुराफ़ात  में

ख़ूब   जम्हूरियत     ख़ूब   तेरा  अदल
रिंद  की   ज़िंदगी   भीड़  के   हाथ  में

क़ातिलों  के  लबों  पर  लहू  की  चमक
जिस  तरह  गुलमोहर  गर्म  हालात  में

मय्यते-यार  है            शान  से  आइए
जिस  तरह   लोग  आते  हैं  बारात  में

कास:-ए-वक़्त   भर  जाएगा  जल्द  ही
इस  क़दर  दर्द    पाए  हैं    ख़ैरात   में  !

                                                                           (2017)

                                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : शैख़ :मद्य विरोधी धर्मोपदेशक; सर-ब-सज्दा : भूमि तक सर झुका कर प्रणाम की मुद्रा में; ख़राबात : मदिरालय; मैकदा :मदिरालय;मुनाजात :प्रार्थना;ज़ो'म :घमंड;लश्कर :सेना(एं); ख़ुराफ़ात : उपद्रव; जम्हूरियत : लोकतंत्र; अदल : न्याय; रिंद : मद्यप; मय्यते-यार : मित्र की शवयात्रा; क़ातिलों : हत्यारों; लबों : होठों; :लहू: रक्त; हालात : ऋतु, वातावरण, परिस्थिति; कास:-ए-वक़्त : समय  भिक्षा-पात्र; ख़ैरात : दान, भिक्षा।  

सोमवार, 22 मई 2017

शाह का दबदबा ....

सोग़  में  है  ख़ुदा,  क्या  हुआ
मर  गए  हम  बुरा  क्या  हुआ

बुझ  गया  चांद  का  क़ुमक़ुमा
चांदनी  का  नशा  क्या  हुआ

रास्ते        मुंतज़िर     ही  रहे
मंज़िलों  का  पता  क्या  हुआ

इश्क़  में  घर  जला  आपका
दुश्मनों  का  भला  क्या  हुआ

जुर्म  के    ज़ोर  के     सामने 
शाह  का  दबदबा  क्या  हुआ

शैख़  हैं   फिर   ख़राबात  में
ख़ुल्द  का  फ़लसफ़ा  क्या  हुआ

नफ़रतों  की   हिदायत  करे
वो  मेरा  मुस्तफ़ा  क्या  हुआ  ?

                                                                               (2017)

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ:






शुक्रवार, 19 मई 2017

नज़्म की ज़िंदगी ...

बता  कौन  तेरी  ख़ुशी  ले  गया
कि  कासा  थमा  कर  ख़ुदी  ले  गया

समझते  रहे  सब  जिसे  बाग़बां
गुलों  के  लबों  से  हंसी  ले  गया

सितारा  रहा  जो  कभी  बज़्म  का
वही  नज़्म  की  ज़िंदगी  ले  गया 

चमन  छोड़  कर  अंदलीबे-सुख़न
बहारों  की  ज़िंदादिली  ले  गया

नज़र  चूकते   ही  ख़ता  हो  गई
कि  लम्हा  चुरा  कर  सदी  ले  गया

सितम   के  नए  दौर  का  शुक्रिया
कि  आंखों  की  सारी  नमी  ले  गया

तलाशे-ख़ुदा  में  कमर  झुक  गई
कि  ये  शौक़  आवारगी  ले  गया  !

                                                                       (2017)

                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: कासा: भिक्षा-पात्र; ख़ुदी: स्वाभिमान; बाग़बां: माली; गुलों: पुष्पों; लबों: होठों; सितारा: नक्षत्र; बज़्म: गोष्ठी; नज़्म: गीत; चमन: उपवन; अंदलीबे-सुख़न: साहित्य की कोयल, मधुर उद्गाता; ज़िंदादिली: जीवंतता; ख़ता: चूक, अपराध; लम्हा: क्षण; सदी: शताब्दी; सितम: अत्याचार; दौर: काल-खंड; तलाशे-ख़ुदा: ईश्वर की खोज; आवारगी: यायावरी। 


मंगलवार, 16 मई 2017

आज़ार -ए-फ़क़ीरी ...

करते  हैं  अश्क  ज़ाया  दामन  की  आड़  कर  के
यानी   वो  ख़ुश  नहीं  हैं    हमसे   बिगाड़  कर  के

थी  जान  जिस्म  में  जब  देखा  न  सर  उठा  कर
अब  दिल  तलाशते  हैं   वो    चीर-फाड़  कर  के

पर्दे  में  भी    किसी  का    दिल  बख़्शते  नहीं  थे
क्या  जान  लीजिए   अब   चेहरा  उघाड़  कर  के

क़ाबिज़  थे  वादिए-दिल   पर  आप  उम्र  भर  से
यूं  अलविदा  न  कहिए  गुलशन  उजाड़  कर  के

किस  काम  के    सिकंदर !     शेरे-बबर   तुम्हारे
पिंजरे  में    छुप  गए  सब     रस्मे-दहाड़  कर  के

शाहों   को     लग   गया   है    आज़ार -ए-फ़क़ीरी
मस्जिद  में  रह  रहे  हैं   घर  को  कबाड़  कर  के

इंसाफ़    हो  रहा  है    माज़ी  की    ग़फ़लतों  का
बदला     चुका  रहे  हैं     मुर्दे  उखाड़   कर  के  !

                                                                                          (2017)

                                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : अश्क :अश्रु; ज़ाया : व्यर्थ; दामन : पल्लू , आंचल; जिस्म : शरीर; पर्दे : आवरण; बख़्शते : छोड़ते; क़ाबिज़ : आधिपत्य में; वादिए-दिल : हृदय की उपत्यका; अलविदा : अंतिम प्रणाम; आज़ार-ए-फ़क़ीरी : साधुता का रोग; माज़ी : अतीत; ग़फ़लतों : भूल-चूकों।  

रविवार, 14 मई 2017

अक़ीदत की सलाख़ें

क़फ़स  में  भी  नमाज़ें  गिन  रहे  हैं
अक़ीदत  की  सलाख़ें  गिन  रहे  हैं

हुकूमत  कर    रहे  हैं   या  तमाशा
ख़िज़ां  में  भी   बहारें   गिन  रहे  हैं

जहालत  के  ज़हर  का  ही  असर  है
बुज़ुर्गों  की     ख़ताएं    गिन  रहे  हैं

हमारे  दुश्मनों  का  साथ  दे  कर
हमारे  दोस्त   आहें   गिन  रहे  हैं

अलिफ़  अल्लाह  का  जो  पढ़  न  पाए
मज़ाहिब  की  किताबें  गिन  रहे  हैं

ख़ुदा  हमसे  ख़ुदा  से  हम  परेशां
मरासिम  की   दरारें  गिन  रहे  हैं

शबे-आख़िर  भी  हम  तन्हा  नहीं  हैं
फ़रिश्तों  की  क़तारें  गिन  रहे  हैं  !

                                                                                (2017)

                                                                           -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ :

सोमवार, 1 मई 2017

नंगी तलवारों के आगे !

यौमे-मज़दूर पर 

लाल सलाम !

सारी  सरकारें  झुकती  हैं  सरमाएदारों  के  आगे 
हम  मेहनतकश  दीवार  बने  हैं  इन  मुर्दारों  के  आगे 

तुम  नाहक़  नाक  रगड़ते  हो  हर  दिन  अख़बारों  के  आगे 
झुकने  को  हम  भी  झुकते  हैं  लेकिन  ख़ुद्दारों  के  आगे 

वो  अपनी  पर  आ  कर  देखें  हम  क्या  तूफ़ान  उठाते  हैं 
तारीख़  हमारे  पीछे  है  फ़र्ज़ी  किरदारों  के  आगे 

ज़रदारों  के  घर  के  होंगे  जो  डर  जाएं  हथियारों  से 
हम  खुल्ला  सीना  रखते  हैं  नंगी  तलवारों  के  आगे  !

                                                                                                         (2017)

                                                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ:



बुधवार, 19 अप्रैल 2017

दाव:-ए-हस्रते-दिल ...

उलझनों  से  भरा  दिल  नहीं  चाहिए
मुफ़्त  में  कोई  मुश्किल  नहीं  चाहिए

जान  ले  जाइए  ग़म  न  होगा  हमें
दाव:-ए-हस्रते-दिल    नहीं  चाहिए

बात  ईमान  की  है  वफ़ा  की  नहीं
इश्क़  में  कोई  हासिल  नहीं  चाहिए

आबले-पाऊं     देते  रहें     हौसला
हर  क़दम  पर  मराहिल  नहीं  चाहिए

रोकने    आए  हैं    राह  तूफ़ान  की
फ़त्ह  से  क़ब्ल   साहिल  नहीं  चाहिए

जीत  या  हार  किरदार  का  खेल  है
जंगे-मैदां   में  बुज़दिल  नहीं  चाहिए

साथ  में  चल  रहा  है  हमारा  क़फ़न
मेह्र्बानि-ए-क़ातिल      नहीं  चाहिए  !

                                                                      (2017)

                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दाव:-ए-हस्रते-दिल : मन की इच्छाओं पर नियंत्रण; ईमान : आस्था; वफ़ा : निष्ठा; हासिल : उपलब्धि; आबले-पाऊं : पांव के छाले; हौसला : साहस; मराहिल : पड़ाव, विश्राम-स्थल; तूफ़ान : झंझावात; फ़त्ह : विजय;   क़ब्ल : पूर्व; साहिल : तट, किनारा; किरदार : चरित्र, व्यक्तित्व; जंगे-मैदां : मैदानी युद्ध; बुज़दिल : कायर मेह्र्बानि-ए-क़ातिल : हत्यारे की कृपा। 

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

सवालाते-दिल ...

ढूंढते  ही  रहे    हम        निशानाते-दिल
बांट  कर    आ  गए    लोग   ख़ैराते-दिल

मा'निए-इश्क़  तक    तो    समझते  नहीं
आप  क्यूं      चाहते  हैं      इनायाते-दिल

आपकी    ख़्वाहिशो-ख़्वाब  से    भी  परे
और  भी  हैं    बहुत-से     सवालाते-दिल

हम  कहें  और  उन  पर  असर  भी  न  हो
रोक  कर    देख  लें   अब  ख़ुराफ़ाते-दिल

रिंद  कम      शैख़  ज़्यादः       परेशान  हैं
बंद     जबसे      हुई  है      ख़राबाते-दिल

बिन  बुलाए     उतर  आए    वो   अर्श  से
और  क्या      देखिएगा      करामाते-दिल

हम  नहीं  तुम  नहीं   मीर-ो-ग़ालिब  नहीं
कौन  सुलझाएगा  फिर  तिलिस्माते-दिल  ?!

                                                                                      ( 2017 )

                                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: निशानाते-दिल : चिह्न, प्रमाण; ख़ैरात : भिक्षा; मा'निए-इश्क़ : प्रेम के अर्थ; इनायात : कृपाएं; ख़्वाहिशो-ख़्वाब : इच्छाओं एवं स्वप्नों; सवालात : प्रश्न, समस्याएं; ख़ुराफ़ात : उपद्रव; रिंद : मदिरा-प्रेमी; शैख़ : उपदेशक; ख़राबात : मदिरालय; अर्श : आकाश, स्वर्ग; करामात : चमत्कार; मीर, ग़ालिब : उर्दू के महानतम शायर द्वय; तिलिस्मात : रहस्य।  

रविवार, 16 अप्रैल 2017

गुलज़ार बाज़ारे-दिल ...

ख़ौफ़  में  जी  रहे  हैं  तरफ़दारे-दिल
घूमते  हैं  खुले   अब   गुनह्गारे-दिल

मुत्मईं  हैं  कि  मग़रिब  न  होगी  कभी
तीरगी  को  समझते  हैं   अन्वारे-दिल

ख़ुश्बू-ए-यार  से  तर  हवा  की  क़सम
ठीक  लगते  नहीं  आज  आसारे-दिल

कोई  क़ीमत  रही  ही  नहीं  इश्क़  की
हर  गली  में  हैं  गुलज़ार   बाज़ारे-दिल

सख़्तजानी-ए-हालात        क्या  पूछिए
मांगते  हैं  लहू    रोज़     किरदारे-दिल

उम्र  भर  जो  अक़ीदत  से  ख़ाली  रहे
आख़िरश  हो  गए    वो  परस्तारे-दिल

आख़िरत  के  लिए    हमसफ़र  चाहिए
ग़ौर  से  पढ़  रहे  हैं  वो  अख़बारे-दिल

एक  ग़ालिब  ही  हम  पर  मेह्र्बां  नहीं
मीर  भी  हैं     हमारे    तलबगारे- दिल  !

                                                                         (2017)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ : 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

दिल का गुमां...

मुहब्बत  न  हो  तो  जहां  क्या  करेगा
ज़मीं  के  बिना   आस्मां   क्या   करेगा

नफ़स  दर  नफ़स  दिल  जहां  टूटते  हों
वहां  कोई  दिल  का  गुमां  क्या  करेगा

यहां   बात    है    मेरी   तन्हाइयों  की
क़फ़स  में  मदद  मेह्रबां  क्या  करेगा

न  दीवारो-दर  है  न  साया  ख़ुदा  का
हिफ़ाज़त  मेरा  आशियां  क्या  करेगा

रग़ों  में   रवां  हो  जहालत  जहां  पर 
बयां  कोई  अह् ले-ज़ुबां  क्या  करेगा

मुसाफ़िर  तड़प  ही  न  पालें  जिगर  में
तो  सर  मंज़िलें  कारवां  क्या  करेगा

कमां  सौंप  दी  हाथ  में  क़ातिलों  के
ये    जम्हूरे-हिंदोस्तां  क्या  करेगा  ?!

                                                                      (2017)

                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः जहां: संसार; ज़मीं : पृथ्वी, आधार; आस्मां : आकाश, ईश्वर; नफ़स: श्वांस; गुमां: गर्व, अहंकार; क़फ़स : पिंजरा, कारागार; 
मेह्रबां : कृपा करने वाला; दीवारो-दर : भित्ति एवं द्वार; साया : छाया; हिफ़ाज़त: सुरक्षा; आशियां : आवास; रग़ों : शिराओं; रवां: प्रवाहमान; जहालत : मूढ़ता; बयां : कथन, उल्लेख, वर्णन; अह् ले-जुबां : भाषाविद, साहित्यकार; जिगर : हृदय; सर : विजित; मंज़िलें : लक्ष्य; 
कारवां : यात्री-दल; कमां : नियंत्रण, सत्ता-सूत्र; जम्हूरे-हिंदोस्तां : भारतीय लोकतंत्र। 




रविवार, 26 मार्च 2017

मौक़ा नहीं मिला ...

हमको  तेरे  विसाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला
इस  पर  तुझे  ख़याल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

ताउम्र  तेरी  फ़िक्र  हमें   इस  तरह  रही
ख़ुद  अपनी  देखभाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

जो  शख़्स  मेरे  साथ  बहुत  दूर  तक  चला
उससे  भी  अर्ज़े-हाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

एहसास  था  उसे  कि  मेरा  दिल  दुखा  दिया
लेकिन  उसे  मलाल  का   मौक़ा  नहीं  मिला

अरमान  था  उन्हें  कि  मेरा  सर  झुका  सकें
आंखों  के  इस्तेमाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

दिल  की  गली  में  आग  लगाने  चले  थे  वो
आशिक़  के  घर  बवाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला

हमने  ख़ुदा  को  तूर  पे  ला  कर  दिखा  दिया
दुनिया  को  फिर  सवाल  का  मौक़ा  नहीं  मिला !

                                                                                      (2017)

                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः विसाल: दर्शन; ख़याल: विचार, चिंता; शख़्स: व्यक्ति; अर्ज़े-हाल: स्थिति बताना; ताउम्र: आजीवन; एहसास: अनुभूति; मलाल: खेद; अरमान: इच्छा; इस्तेमाल: प्रयोग; आशिक़: प्रेमी; बवाल: उत्पात; तूर: अरब के साम क्षेत्र में एक मिथकीय पर्वत, जहां हज़रत मूसा अ. स. के बुलाने पर ईश्वर के प्रकट होने का आख्यान है।  

शनिवार, 25 मार्च 2017

ज़ीस्त का इंतज़ार...

शाह  पर  एतबार  किसको  है
ये:  दिमाग़ी  बुख़ार  किसको  है

हाकिमों  की  अदा  गवाही  है
हैसियत  का  ख़ुमार  किसको  है

ज़ार  सबको  थमा  गया  कासा
दिक़्क़ते-रोज़गार   किसको  है

थक  गए  जिस्म  .गुंच:-ओ-गुल  के
अब  उमीदे-बहार  किसको  है

हम  फ़क़ीरी  में  मस्त  हैं  अपनी
चाहते-इक़्तिदार  किसको  है

मौत  सफ़  में  लगा  गई  जबसे
ज़ीस्त  का  इंतज़ार  किसको  है

देख  लेंगे  नमाज़  भी  पढ़  कर
आस्मां   पर  क़रार  किसको  है !

                                                                    (2017)

                                                             -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः एतबार: विश्वास; हाकिमों: सत्ताधारियों, अधिकारियों; अदा: भंगिमा; गवाही: साक्ष्य; हैसियत: प्रास्थिति; ख़ुमार: मद; ज़ार: अत्याचारी शासक; कासा: भिक्षा-पात्र; दिक़्क़ते-रोज़गार: आजीविका की कठिनाई; जिस्म: शरीर; .गुंच:-ओ-गुल: कलियां और फूल; उमीदे-बहार: बसंत की आशा; फ़क़ीरी: सधुक्कड़ी, निर्धनता; चाहते-इक़्तिदार: सत्ता-प्राप्ति की इच्छा; सफ़: पंक्ति; ज़ीस्त: जीवन; क़रार: आश्वस्ति।  


शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मसख़रों का ज़माना ...

ख़रों  को  मुबारक  ख़रों  का  ज़माना
अजब  सरफिरे   रहबरों  का  ज़माना

न  देखेगी  नरगिस  न  गाएगी  बुलबुल
न  आएगा     दीदावरों  का    ज़माना

जहां  मौसिक़ी  की  इजाज़त  न  होगी
वहां  क्या  करेगा    सुरों  का  ज़माना

जिन्होंने  चुना  है  बड़े  शौक़  से  अब
निभाएं  वही    मसख़रों  का   ज़माना

ये  जम्हूर  आख़िर  कहां  तक  सहेगा
सियासत  के   बाज़ीगरों  का  ज़माना

चुराने  लगा   मुफ़लिसों  की   कमाई
नई   तर्ज़  के   मुख़बिरों  का  ज़माना

यही  वक़्त  है  लाल  परचम  उठाओ
बदल  दो   बड़े  साहिरों  का  ज़माना

मुहब्बत   बसाएगी   वो  घर   दोबारा
मिटाएगा  जो   ताजिरों  का   ज़माना !

                                                                (2016)

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थः ख़रों : गधों; रहबरों: नेताओं; नरगिस: एक फूल, जिसकी एक पंखुड़ी में आंख के समान आकृति बनी होती है; बुलबुल: कोयल; दीदावरों: दृष्टि-संपन्न व्यक्तियों; मसख़रों: भांडों; जम्हूर: लोकतंत्र; सियासत: राजनीति; बाज़ीगरों: खिलाड़ियों; परचम: ध्वज, पताका; मुफ़लिसों: वंचितों, दीन हीनों; तर्ज़: शैली; साहिरों: जादूगरों, मायावियों; मुख़बिरों: टोह लेने वालों; ताजिरों: व्यापारियों, पूंजीपतियों।  


रविवार, 5 मार्च 2017

फ़रेब सीरत के ...

मुद्द'आ  यूं  मिटा  तमाशों  में
दब  गई  आह  ढोल-ताशों  में

सोज़े-तकरीर  हुस्न  खो  बैठा
तल्ख़  तन्क़ीदो-इफ़्तिराशों  में

शक्ले-इंसां  नज़र  नहीं  आती
मसख़रों  से  भरी  क़िमाशों  में

रहनुमा  आए  हैं  दवा  ले कर
फूंकने  जान    सर्द  लाशों  में

हैं  नुमाया  फ़रेब  सीरत  के
शाह  के  रेशमी  क़ुमाशों  में 

गंद  में  जिस्म  सन  गया  सारा
साफ़  किरदार  की  तलाशों  में

खेलिए  क्या  ग़रीब  के  दिल  से
.खूं  छलक  आएगा  ख़राशों  में !

                                                                  (2017)

                                                           -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मुद्द'आ: विषय; सोज़े-तकरीर: भाषण का माधुर्य; हुस्न: सौंदर्य; तल्ख़: तीक्ष्ण; तन्क़ीदो-इफ़्तिराशों: टिप्पणियों एवं निंदाओं; शक्ले-इंसां: मनुष्य का रूप; मसख़रों: भांडों; क़िमाशों: ताश की गड्डियों; रहनुमा: मार्ग दिखाने वाले, नेता गण; सर्द लाशों: ठंडे शवों; नुमाया: प्रकट; फ़रेब: छद्म; सीरत: चरित्र, स्वभाव; क़ुमाशों: वस्त्र-विन्यास, रूप-सज्जा; गंद: मलिनता; जिस्म: देह; किरदार: चरित्र, व्यक्तित्व; तलाशों: अनुसंधानों; .खूं : रक्त, ख़राशों: खरोंचों ।


 

बुधवार, 1 मार्च 2017

खिलेंगे ख़ुद-ब-ख़ुद ...

जो  दानिशवर  परिंदों  की  ज़ुबां  को  जानते  हैं
यक़ीनन  वो   तिलिस्मे-आसमां    को  जानते  हैं

तू  कहता  रह  कि  तू  ख़ुद्दार  है  झुकता  नहीं  है
मगर   हम  भी   तेरे   हर  मेह्रबां    को  जानते  हैं

वही     बातें      वही     वादे     वही     बेरोज़गारी
वतन  के   नौजवां   सब  रहनुमां  को    जानते  हैं

कहां  नीयत  कहां  नज़रें  कहां  मंज़िल  सफ़र  की
सभी   रस्ते     अमीरे-कारवां      को    जानते  हैं

खिलेंगे  ख़ुद-ब-ख़ुद  दिल  में  किसी  दिन  आपके  भी
गुलो-ग़ुञ्चे   मुहब्बत  के    निशां     को   जानते  हैं

कहीं  ये  आ  गए  ज़िद  पर  तो  दुनिया  को  डुबो  दें
तेरे   लश्कर    मेरे  अश्के-रवां     को    जानते  हैं

तेरे  अहकाम  पर    चलती  नहीं    मख़लूक़  तेरी
इलाही !  हम    तेरे  दर्दे-निहां    को     जानते  हैं  !

                                                                                                     (2017)

                                                                                                -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दानिशवर : विद्वत्जन; परिंदों : पक्षियों; ज़ुबां : भाषा; यक़ीनन : निश्चय ही; तिलिस्मे-आसमां : आकाश/ईश्वर का रहस्य; ख़ुद्दार : स्वाभिमानी; मेह्रबां : कृपा करने वाले; रहनुमां : नेता गण; अमीरे-कारवां : यात्री दल का प्रमुख; ख़ुद-ब-ख़ुद : स्वयंमेव; गुलो-ग़ुञ्चे : पुष्प एवं कलियां; निशां : चिह्न; लश्कर : सैन्य-दल; अश्के-रवां : बहते आंसू; अहकाम : आदेशों; मख़लूक़ : सृष्टि; इलाही : ईश्वर; दर्दे-निहां : गुप्त पीड़ा ।


मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

...धार रखते हैं !

आप  पर  एतबार  रखते  हैं
हम  युं  ही  जी  को  मार  रखते  हैं

चोट  खाना  नसीब  है  अपना
हसरतें  तो  हज़ार  रखते  हैं

कौन  जाने  कि  क्या  पिला  डालें
जो  नज़र  में  ख़ुमार  रखते  हैं

राज़े-सेहत  बताएं  क्या  अपना
दर्द  दिल  पर  सवार  रखते  हैं

काटिए  क्या  हुज़ूर  ख़ंजर  से
हम  अभी  सर  उतार  रखते  हैं

बाज़  आएं  नज़र  मिलाने  से
हम  बहुत  तेज़  धार  रखते  हैं

कौन  हमको  वफ़ा  सिखाएगा
हम  जिगर  तार-तार  रखते  हैं

दीजिए  बद्दुआ  हमें  खुल  कर
हम  सभी  कुछ  उधार  रखते  हैं

मौत  आई  है  जायज़ा  लेने
दुश्मनों  को  पुकार  रखते  हैं !

                                                                   (2017)

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: एतबार: विश्वास; नसीब: प्रारब्ध; हसरतें: लालसाएं; ख़ुमार: मदिरता; राज़े-सेहत: स्वास्थ्य का रहस्य; ख़ंजर: क्षुरि; बाज़  आना : दूर रहना; बद्दुआ: अशुभकामना; जायज़ा : पर्यवेक्षण।


सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

हम चराग़े-वफ़ा...

क़ैदे-ज़िन्दां-ए-उम्मीद  में  मिट  गए
हम  मुहब्बत  की  ताईद  में  मिट  गए

चंद  जज़्बात  उन  पर  खुले  ही  नहीं
चंद  अश्'आर  तन्क़ीद  में  मिट  गए

थे  मुनव्वर  कई  नाम  तारीख़  में
शाह  की  मश्क़े-तज्दीद  में  मिट  गए

ढूंढते  हैं  निशानात  तहज़ीब  के
जो  जहालत  की तह् मीद  में  मिट   गए

उम्र  भर  जो  हवस  में  भटकते  रहे
वो  फ़क़ीरों  की  तक़लीद  में  मिट  गए

हम  चराग़े-वफ़ा  थे  अज़ल  तक  जिए
क़ुमक़ुमे  रश्क़े-ख़ुर्शीद  में  मिट  गए

लोग  शिर्के-जली  में  वली  हो  गए
और  हम  फ़िक्रे-तौहीद  में  मिट  गए  !

                                                                           (2017)

                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: क़ैदे-ज़िन्दां-ए-उम्मीद : आशा के कारागार का बंधन; ताईद : अनुमोदन, पक्षधरता; जज़्बात : भावनाएं; अश्'आर: (अनेक) शे'र, शे'र का बहुवचन; तन्क़ीद : टीका-टिप्पणी, आलोचना; मुनव्वर : प्रकाशवान, उज्ज्वल; तारीख़ : इतिहास; मश्क़े-तज्दीद : नवीनीकरण के प्रयास; निशानात : चिह्न (बहु.); तहज़ीब : सभ्यता; जहालत : अज्ञान, जड़ता; तह् मीद : प्रशंसा; हवस : वासना, लोभ; फ़क़ीरों : संतों, सिद्ध जन; तक़लीद : अनुकरण; चराग़े-वफ़ा : आस्था-दीप; अज़ल : प्रलय, नई सृष्टि का आरंभ; क़ुमक़ुमे : कृत्रिम, दिखावटी दीपक; रश्क़े-ख़ुर्शीद : सूर्य से ईर्ष्या; शिर्के-जली : जान-बूझ कर की जाने वाली व्यक्ति-पूजा, चापलूसी; फ़िक्रे-तौहीद: अद्वैत-चिंतन।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

शिफ़ा ज़रूरी है !

मुफ़लिसी  में  अना  ज़रूरी  है
दोस्तों  की    दुआ    ज़रूरी  है

इश्क़  से  डर  हमें  नहीं  लगता
गो  मुआफ़िक़  हवा  ज़रूरी  है

आप  तड़पाएं  या  तसल्ली   दें
दर्दे-दिल  में  शिफ़ा  ज़रूरी  है

शौक़  रखिए  तबाह  करने  का
पर  कहीं  तो  वफ़ा  ज़रूरी  है

बात  दिल  की  हो  या  ज़माने  की
साफ़  हो    मुद्द'आ   ज़रूरी  है

जुर्म  कब  तक  छुपाए  रखिएगा
आख़िरत  में  सज़ा  ज़रूरी  है

मुर्शिदों  का   मयार   पाने   को
क्या    फ़रेबे-ख़ुदा   ज़रूरी  है ?

                                                               (2017)

                                                         -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ : मुफ़लिसी : निर्धनता; अना : स्वाभिमान; गो : यद्यपि; मुआफ़िक़ : स्वभावानुकूल; तसल्ली : सांत्वना; शिफ़ा : रोग-मुक्ति; मुद्द'आ : उचित विषय; जुर्म : अपराध; आख़िरत : परलोक, अंतिम परिणाम; मुर्शिदों : सिद्ध संतों; मयार : स्तर ।


गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

देते हो धोखा ...

देते  हो  धोखा  महफ़िल  में
क्या  शर्म  नहीं  बाक़ी  दिल  में

ज़ंग-आलूदा  हैं  सब  छुरियां
वो  बात  नहीं  अब  क़ातिल  में

मुस्तैद  रखो  फ़र्ज़ी  अपना
है  शाह  तुम्हारा  मुश्किल  में

हम  सज्दा  करते  जाते  हैं
तुम  रंज़िश  रखते  हो  दिल  में

शम्'.अ  हमसे  कह  कर  देखे
हम  आग  लगा  दें  महफ़िल  में

तूफ़ां  तो  सिर्फ़  दिखावा  है
गिर्दाब  छुपे  हैं  साहिल  में

माज़ी  को  आग  लगा  आए
देखें  क्या  है  मुस्तक़्बिल  में  !

                                                        (2017)

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: महफ़िल : सभा; ज़ंग-आलूदा : ज़ंग लगी हुई, क्षरित; मुस्तैद: सन्नद्ध; फ़र्ज़ी : शतरंज के खेल का सबसे शक्तिशाली मोहरा, वज़ीर; सज्दा:आपादमस्तक प्रणाम; रंज़िश: वैमनस्य; तूफ़ां: झंझावात; गिर्दाब: भंवर, जलावर्त्त; साहिल: तट; माज़ी : अतीत; मुस्तक़्बिल : भविष्य ।


बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

दर्दे-दिल के अफ़्आल ...

सल्तनत   के  ज़वाल  की  आहें
ज़र्द    जाहो-जलाल    की  आहें

मांगती  हैं  हिसाब  वहशत  का
हर  सुलगते   सवाल  की  आहें

लफ़्ज़  शायद  बयां  न  कर  पाएं
नर्मो-नाज़ुक़  ख़्याल  की  आहें

पढ़  रही  हैं  मिज़ाज  यारों  का
मुफ़्लिसे-ख़स्त:हाल   की  आहें

आप  सहते  तो  याद  भी  रखते
हिज्र  के  माहो-साल  की  आहें

क़ैदे-सफ़्हात    में   तड़पती  हैं
दर्दे-दिल  के अफ़्आल  की  आहें

काश !  हमदर्द  कोई  गिन  पाता
इस  दिले-बेमिसाल   की   आहें !

                                                             (2017)

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: सल्तनत : राज; ज़वाल: पतन; ज़र्द: निस्तेज; जाहो-जलाल: तेज-प्रताप; वहशत: भयानक व्यवहार; लफ़्ज़; शब्द; बयां; व्यक्त; नर्मो-नाज़ुक़; कोमल एवं मृदुल; मिज़ाज; तबीयत; हिज्र: वियोग; माहो-साल; महीने एवं वर्ष; क़ैदे-सफ़्आत : पृष्ठों में बंदी; अफ़्आल: रचना-संग्रह; हमदर्द; पीड़ा में सहभागी, सहानुभूतिशील; दिले-बेमिसाल; अप्रतिम हृदय ।