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बुधवार, 16 जनवरी 2013

दश्त में नन्हा पौधा

तेरे   नूर   का    चेहरा   हूँ
दश्त  में    नन्हा  पौधा  हूँ

पढ़ ले मुझे गीता की तरह
कैसे  कहूँ  के:  मैं  क्या  हूँ

याद न कर इस वक़्त मुझे
मैं   सज्दे   में     बैठा     हूँ

गोश:-ए-दिल में  ढूंढ  ज़रा
अपने  घर   कब  रहता  हूँ

मैं  न  समझ पाऊंगा   तुझे
ख़ुद को ही   कब  समझा हूँ

तोड़  न  दे  उम्मीद-ए-वफ़ा
नाज़ुक    शीशे - जैसा     हूँ

तेरे  नूर  की   बात ही  क्या
क़तरा-क़तरा    पीता    हूँ।

                                (2011)

                  -सुरेश स्वप्निल

शब्दार्थ: तेरे नूर का चेहरा :ख़ुदा ,  निराकार ब्रह्म के प्रकाश का साकार  रूप;   दश्त: वन ;   सज्दे में: ध्यान-मुद्रा में 
                  गोश:- कोना ,  क़तरा : बूँद 

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