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मंगलवार, 6 जून 2017

कितना ख़ूं, कितना पानी...

वैसे  तो  दुनिया  फ़ानी  है
सच  के  साथ  परेशानी  है

ख़ुद्दारों  पर  दाग़  लगाना
मग़रूरों  की  नादानी  है

शाहों  से  डर  जाने  वालो
यह  रुत  भी  आनी-जानी  है

संगीनों  पर  चल  कर  जीना
ज़िद  अपनी  जानी-मानी  है

अब  जम्हूर  कहां  रक्खा  है
सरकारों  की  मनमानी  है

रैयत  उतरी  है  सड़कों  पर
हाकिम  को  क्यूं  हैरानी  है

हम  भी  देखें  किन  आंखों  में
कितना  ख़ूं  कितना  पानी  है  !

                                                                           (2017)

                                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: फ़ानी : नश्वर; ख़ुद्दारों : स्वाभिमानियों; दाग़ : दोष; मग़रूरों : घमंडियों, अहंकारियों; नादानी : अज्ञान; जम्हूर : लोकतंत्र; रैयत : नागरिक गण; हाकिम : आदेश देने वाला, शासक; ख़ूं। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (08-06-2017) को
    "सच के साथ परेशानी है" (चर्चा अंक-2642)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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