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शुक्रवार, 4 मई 2018

सर बचा कर...

सियासत  सीख  कर  पछताए  हो  क्या
सलामत  सर  बचा  कर  लाए  हो  क्या

उड़ी  रंगत   कहीं   सब   कह  न  डाले
हमारे    तंज़  से    मुरझाए      हो  क्या

लबों  पर    बर्फ़   आंखों  में      उदासी
कहीं  पर  चोट  दिल की  खाए हो  क्या

बहुत  दिन  बाद  ख़ुश  आए  नज़र   तुम
हमारे    ख़्वाब   से    टकराए   हो    क्या

तुम्हारी    नब्ज़    इतनी    सर्द     क्यूं  है
किसी  का  क़त्ल   करके  आए  हो  क्या

सितम   हर  शाह  करता  है   मगर   तुम
किसी  जल्लाद  के   सिखलाए  हो  क्या

नमाज़ें      पढ़    रहे    हो       पंजवक़्ता
ख़ुदा   के    ख़ौफ़  से    थर्राए    हो  क्या ?!

                                                                  -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ : सियासत: राजनीति;  सलामत :सुरक्षित; तंज़: व्यंग्य; लबों: होंठों; नब्ज़: नाड़ी, स्पंदन; सर्द:ठंडी; सितम: अत्याचार; जल्लाद: वधिक; पंजवक़्ता: पांचों समय की; ख़ौफ़: भय ।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

करो हो क़त्ल ....

परेशां  हैं  यहां  तो  थे  वहां  भी
करे  है  तंज़  हम  पर  मेह्र्बां  भी

हमें  ज़ाया  न  समझें  साहिबे-दिल
हरारत  है  अभी  बाक़ी  यहां  भी

दिए  थे  जो  वफ़ा  के  ज़ख़्म  तुमने
लगे  हैं  फिर  नए  से  वो  निशां  भी
 लगा  है  मर्ज़  जबसे  दिलकशी  का
करो  हो  क़त्ल  जाओ  हो  जहां  भी

बुज़ुर्गों  ने    बहुत     बहलाए  रक्खा
मगर  बेताब  हैं     अब   नौजवां  भी

ख़बर  होगी  तभी  अह् ले  वतन  को
लुटेंगे     जब        अमीरे  कारवां  भी

जहां  को     नूर  वो     दे  जाएंगे  हम
करेगा  फ़ख़्र     हम  पर   आस्मां  भी !

                                                                             (2018)

                                                                         -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तंज़: व्यंग्य; मेह्रबां: भले मानुस, कृपालु; ज़ाया: नष्टप्राय, व्यर्थ; साहिबे दिल: हृदयवान, संवेदनशील; हरारत: ऊष्मा, इच्छाएं; वफ़ा: निष्ठा; ज़ख़्म: घाव; निशां: चिह्न; मर्ज़: रोग; दिलकशी: मन जीतने, चित्ताकर्षक लगने; करो हो: करते हो; क़त्ल:  हत्या; जाओ हो: जाते हो; बुज़ुर्गों: वरिष्ठ जन; बेताब: व्याकुल; नौजवां: युवजन; ख़बर: बोध; अह् ले वतन: देशवासी; अमीरे कारवां: यात्री दाल के नायक, सत्ताधीश; जहां: संसार; नूर: प्रकाश; फ़ख़्र: गर्व; आस्मां: विधाता।  

रविवार, 22 अप्रैल 2018

बग़ावत का सैलाब ...

मोहसिनों   की    आह    बेपर्दा  न  हो
शर्म  से    मर  जाएं   हम  ऐसा  न  हो

इश्क़  का  इल्ज़ाम  हम  पर  ही  सही
तू   अगर    ऐ  दोस्त     शर्मिंदा  न  हो

ख़ाक   ऐसी  ज़ीस्त  पर    के:  ग़ैर  के
दर्द  का   एहसास  तक   ज़िंदा  न  हो

बेबसी  से     आस्मां   तक       रो  पड़े
ज़ुल्म    नन्ही  जान  पर   इतना  न  हो

अब     बग़ावत  का    उठे  सैलाब  वोः
जो  कभी     तारीख़   ने    देखा  न  हो

ऐहतरामे-नूर         यूं        कर  देखिए
सर  झुका  हो  और   बा-सज्दा  न  हो

कोई  तो    रक्खे  हमें    दिल  में  कहीं
आख़िरत  का  वक़्त  यूं  ज़ाया   न   हो !

                                                                            (2018)

                                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मोहसिनों: कृपालु जन; बेपर्दा: प्रकट, अनावृत्त; इल्ज़ाम: आरोप; शर्मिंदा: लज्जित; ख़ाक: धूल; ज़ीस्त: जीवन; ग़ैर: अन्य; एहसास: अनुभूति; बग़ावत: विद्रोह; सैलाब: बाढ़; तारीख़: इतिहास; बेबसी: विवशता; आस्मां: नियति; ज़ुल्म: अन्याय, अत्याचार; ऐहतरामे-नूर: (ईश्वरीय) प्रकाश का सम्मान, सम्बोधि का सम्मान; बा-सज्दा: श्रद्धावनत; आख़िरत: अंतिम समय; ज़ाया: व्यर्थ।  

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

क्या मिल गया ?

गर्दिशे-ऐयाम  से            दिल  हिल  गया
आज  का  दिन  भी  बहुत  मुश्किल  गया

देख  कर  हमको              परेशां  दर्द  से
आसमानों  का  कलेजा            हिल  गया

चाहते  थे        रोक  लें           तूफ़ान  को
सब्र  टूटा        हाथ  से         साहिल  गया

क़ातिलों  की             पैरवी      करते  हुए
साफ़  कहिए  रहबरों !     क्या  मिल  गया

शाह  की       लफ़्फ़ाज़ियों  में       यूं  फंसे 
नौजवां  से      दूर            मुस्तक़्बिल  गया

राह    मुश्किल  थी     बग़ावत  की    मगर
हर  जियाला              जानिबे-मंज़िल  गया

हालते-अत्फ़ाले-दुनिया               देख  कर
क्या  बताएं      रूह  में     क्या  छिल  गया !

                                                                                   (2018)

                                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: गर्दिशे-ऐयाम : दिनों का फेर; सब्र: धैर्य; साहिल: तट, किनारा; क़ातिलों: हत्यारों; पैरवी : पक्ष रखना, बचाव; रहबरों : नेता गण; लफ़्फ़ाज़ियों : शब्दजाल; मुस्तक़्बिल : भविष्य; बग़ावत : विद्रोह; जियाला : साहसी; जानिबे-मंज़िल : लक्ष्य की ओर; हालते-अत्फ़ाले-दुनिया : संसार के बच्चों की स्थिति; रूह : आत्मा।  


मंगलवार, 20 मार्च 2018

नरगिस और हम

हर  तरफ़  मौजे हवादिस  और  हम
सामने      सुल्ताने बेहिस  और  हम

आज फिर उम्मीद का  सर झुक गया
फिर  वही गुस्ताख़ इब्लीस  और हम

क्या  मुक़द्दर  है   वफ़ा  का    देखिए
गर्दिशों  में  ख़्वाबे नाक़िस  और  हम

फिर   ज़ुबानी   जंग  में  हैं   मुब्तिला
शाह  के  मुंहज़ोर  वारिस  और   हम

तोड़  डालेंगे  सितम  का  सिलसिला 
साथ में  दो चार  मुफ़लिस  और  हम

गुल  खिलाते  हैं  मुनासिब  वक़्त पर
नूर  के    शैदाई    नरगिस  और  हम

कोई    तो   पढ़  दे   हमारा   मर्सिया
दर्दमंदों   की   मजालिस   और  हम !

                                                       (2018)

                                                  -सुरेश स्वप्निल

शब्दार्थ : मौजे हवादिस: दुर्घटनाओं की लहर; सुल्ताने बेहिस: असंवेदनशील, निश्चेत शासक; गुस्ताख़: धृष्ट;
इब्लीस: ;शैतान, ईश्वर का प्रतिद्वंद्वी; मुक़द्दर: भाग्य;  वफ़ा: निष्ठा; गर्दिश: भटकाव; ख़्वाबे नाक़िस: अपूर्ण स्वप्न;
ज़ुबानी जंग: मौखिक युद्ध; मुब्तिला: फंसे हुए, ग्रस्त; मुंहज़ोर: वाग्वीर; वारिस: उत्तराधिकारी; सितम: अत्याचार; सिलसिला: क्रम, श्रृंखला; मुफ़लिस: निर्धन; मुनासिब: समुचित; नूर:प्रकाश; शैदाई: अभिलाषी, प्रेमी; नरगिस: एक पुष्प, लिली; मर्सिया: शोकगीत; दर्दमंद: सहानुभूतिशील; मजालिस: सभाएं।

सोमवार, 12 मार्च 2018

हमारे ज़ख़्म उरियां...

तबाही  के    ये:  मंज़र    देख  लीजे
कहां  धड़  है  कहां  सर  देख  लीजे

बुतों के  साथ क्या क्या  ढह  गया है
ज़रा    गर्दन  घुमा  कर    देख  लीजे

चले  हैं  लाल  परचम  साथ  ले  कर
कहां  पहुंचे   मुसाफ़िर    देख  लीजे

खड़े  हैं  रू ब रू    मज़्लूमो-ज़ालिम
गिरेगी  बर्क़    किस पर   देख  लीजे

हमारे  ज़ख़्म    उरियां    हो  गए   हैं
यही  है  वक़्त   जी-भर   देख  लीजे

किसी  ने   आपको  बहका  दिया  है
मैं  शीशा  हूं   न  पत्थर   देख  लीजे

कहेगा कौन  दिल की  बात  खुल कर
मेरे    सीने  के    नश्तर    देख  लीजे  !

शब्दार्थ : तबाही : विध्वंस; मंज़र : दृश्य; बुतों : मूर्त्तियों ; परचम : ध्वज; मुसाफ़िर :यात्री; रू बरू: आमने-सामने; मज़्लूमो-ज़ालिम : पीड़ित और अत्याचारी; बर्क़: आकाशीय बिजली; ज़ख़्म : घाव; उरियां: अनावृत, उघड़े हुए; शीशा : कांच; नश्तर : शल्यक्रिया का उपकरण, क्षुरी।

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

ख़ामुशी बेज़ुबां ...

ख़ुश्बुए-दिल  जहां  नहीं  होती
कोई  बरकत  वहां  नहीं  होती

हौसले   साथ- साथ    बढ़ते  हैं
सिर्फ़  हसरत  जवां  नहीं  होती

ज़र्फ़  है   तो    निगाह   बोलेगी
ख़ामुशी    बेज़ुबां    नहीं   होती

ज़िंदगी  दर -ब- दर  भटकती  है
और  फिर  भी   रवां  नहीं  होती

ज़ीस्त  जब जब  फ़रेब  करती  है
मौत  भी     मेह्रबां     नहीं   होती

फ़र्ज़  है  दिल  संभाल  कर  रखना
बेक़रारी        कहां       नहीं  होती

रूह  से    जो  दुआ    निकलती  है
वो:  कभी      रायग़ां     नहीं  होती !

                                                             (2018)
         
                                                        -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: ख़ुश्बुए-दिल : मन की सुगंध; बरकत : अभिवृद्धि, श्री वृद्धि; हौसले :साहस,उत्साह; हसरत : अभिलाषा; जवां: युवा; ज़र्फ़ : गंभीरता; निगाह :दृष्टि;  ख़ामुशी :मौन; दर ब दर:द्वार द्वार;  रविं:सुचारु, प्रवाहमान;ज़ीस्त :जीवन; फ़रेब: कपट; मेह्रबां : दयावान;  फ़र्ज़: कर्त्तव्य;  बेक़रारी :व्यग्रता;  रूह: आत्मा, अंतर्मन;  दुआ: प्रार्थना;  रायग़ां :व्यर्थ ।