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सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

हम चराग़े-वफ़ा...

क़ैदे-ज़िन्दां-ए-उम्मीद  में  मिट  गए
हम  मुहब्बत  की  ताईद  में  मिट  गए

चंद  जज़्बात  उन  पर  खुले  ही  नहीं
चंद  अश्'आर  तन्क़ीद  में  मिट  गए

थे  मुनव्वर  कई  नाम  तारीख़  में
शाह  की  मश्क़े-तज्दीद  में  मिट  गए

ढूंढते  हैं  निशानात  तहज़ीब  के
जो  जहालत  की तह् मीद  में  मिट   गए

उम्र  भर  जो  हवस  में  भटकते  रहे
वो  फ़क़ीरों  की  तक़लीद  में  मिट  गए

हम  चराग़े-वफ़ा  थे  अज़ल  तक  जिए
क़ुमक़ुमे  रश्क़े-ख़ुर्शीद  में  मिट  गए

लोग  शिर्के-जली  में  वली  हो  गए
और  हम  फ़िक्रे-तौहीद  में  मिट  गए  !

                                                                           (2017)

                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: क़ैदे-ज़िन्दां-ए-उम्मीद : आशा के कारागार का बंधन; ताईद : अनुमोदन, पक्षधरता; जज़्बात : भावनाएं; अश्'आर: (अनेक) शे'र, शे'र का बहुवचन; तन्क़ीद : टीका-टिप्पणी, आलोचना; मुनव्वर : प्रकाशवान, उज्ज्वल; तारीख़ : इतिहास; मश्क़े-तज्दीद : नवीनीकरण के प्रयास; निशानात : चिह्न (बहु.); तहज़ीब : सभ्यता; जहालत : अज्ञान, जड़ता; तह् मीद : प्रशंसा; हवस : वासना, लोभ; फ़क़ीरों : संतों, सिद्ध जन; तक़लीद : अनुकरण; चराग़े-वफ़ा : आस्था-दीप; अज़ल : प्रलय, नई सृष्टि का आरंभ; क़ुमक़ुमे : कृत्रिम, दिखावटी दीपक; रश्क़े-ख़ुर्शीद : सूर्य से ईर्ष्या; शिर्के-जली : जान-बूझ कर की जाने वाली व्यक्ति-पूजा, चापलूसी; फ़िक्रे-तौहीद: अद्वैत-चिंतन।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

शिफ़ा ज़रूरी है !

मुफ़लिसी  में  अना  ज़रूरी  है
दोस्तों  की    दुआ    ज़रूरी  है

इश्क़  से  डर  हमें  नहीं  लगता
गो  मुआफ़िक़  हवा  ज़रूरी  है

आप  तड़पाएं  या  तसल्ली   दें
दर्दे-दिल  में  शिफ़ा  ज़रूरी  है

शौक़  रखिए  तबाह  करने  का
पर  कहीं  तो  वफ़ा  ज़रूरी  है

बात  दिल  की  हो  या  ज़माने  की
साफ़  हो    मुद्द'आ   ज़रूरी  है

जुर्म  कब  तक  छुपाए  रखिएगा
आख़िरत  में  सज़ा  ज़रूरी  है

मुर्शिदों  का   मयार   पाने   को
क्या    फ़रेबे-ख़ुदा   ज़रूरी  है ?

                                                               (2017)

                                                         -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ : मुफ़लिसी : निर्धनता; अना : स्वाभिमान; गो : यद्यपि; मुआफ़िक़ : स्वभावानुकूल; तसल्ली : सांत्वना; शिफ़ा : रोग-मुक्ति; मुद्द'आ : उचित विषय; जुर्म : अपराध; आख़िरत : परलोक, अंतिम परिणाम; मुर्शिदों : सिद्ध संतों; मयार : स्तर ।


गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

देते हो धोखा ...

देते  हो  धोखा  महफ़िल  में
क्या  शर्म  नहीं  बाक़ी  दिल  में

ज़ंग-आलूदा  हैं  सब  छुरियां
वो  बात  नहीं  अब  क़ातिल  में

मुस्तैद  रखो  फ़र्ज़ी  अपना
है  शाह  तुम्हारा  मुश्किल  में

हम  सज्दा  करते  जाते  हैं
तुम  रंज़िश  रखते  हो  दिल  में

शम्'.अ  हमसे  कह  कर  देखे
हम  आग  लगा  दें  महफ़िल  में

तूफ़ां  तो  सिर्फ़  दिखावा  है
गिर्दाब  छुपे  हैं  साहिल  में

माज़ी  को  आग  लगा  आए
देखें  क्या  है  मुस्तक़्बिल  में  !

                                                        (2017)

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: महफ़िल : सभा; ज़ंग-आलूदा : ज़ंग लगी हुई, क्षरित; मुस्तैद: सन्नद्ध; फ़र्ज़ी : शतरंज के खेल का सबसे शक्तिशाली मोहरा, वज़ीर; सज्दा:आपादमस्तक प्रणाम; रंज़िश: वैमनस्य; तूफ़ां: झंझावात; गिर्दाब: भंवर, जलावर्त्त; साहिल: तट; माज़ी : अतीत; मुस्तक़्बिल : भविष्य ।


बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

दर्दे-दिल के अफ़्आल ...

सल्तनत   के  ज़वाल  की  आहें
ज़र्द    जाहो-जलाल    की  आहें

मांगती  हैं  हिसाब  वहशत  का
हर  सुलगते   सवाल  की  आहें

लफ़्ज़  शायद  बयां  न  कर  पाएं
नर्मो-नाज़ुक़  ख़्याल  की  आहें

पढ़  रही  हैं  मिज़ाज  यारों  का
मुफ़्लिसे-ख़स्त:हाल   की  आहें

आप  सहते  तो  याद  भी  रखते
हिज्र  के  माहो-साल  की  आहें

क़ैदे-सफ़्हात    में   तड़पती  हैं
दर्दे-दिल  के अफ़्आल  की  आहें

काश !  हमदर्द  कोई  गिन  पाता
इस  दिले-बेमिसाल   की   आहें !

                                                             (2017)

                                                      -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: सल्तनत : राज; ज़वाल: पतन; ज़र्द: निस्तेज; जाहो-जलाल: तेज-प्रताप; वहशत: भयानक व्यवहार; लफ़्ज़; शब्द; बयां; व्यक्त; नर्मो-नाज़ुक़; कोमल एवं मृदुल; मिज़ाज; तबीयत; हिज्र: वियोग; माहो-साल; महीने एवं वर्ष; क़ैदे-सफ़्आत : पृष्ठों में बंदी; अफ़्आल: रचना-संग्रह; हमदर्द; पीड़ा में सहभागी, सहानुभूतिशील; दिले-बेमिसाल; अप्रतिम हृदय ।


गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

चुप लगा रखिए...

दिल  बड़ी  चीज़  है  बचा  रखिए
हां,  मगर  रास्ता  खुला  रखिए

शर्त्त  है  वस्ल  के  लिए  उनकी
'घर  शहंशाह  से  बड़ा  रखिए'

दें  मुनासिब  जगह  रक़ीबों  को
बज़्म  का  क़ायदा  बना  रखिए

आज  पूरी  न  हों  तो  कल  होंगी
हसरतों  को  हरा-भरा  रखिए

गर  दुआ  चाहिए  फ़क़ीरों  की
घर  जलाने  का  हौसला  रखिए

रू  ब  रू  है  निज़ाम  क़ातिल  का
लड़  न  पाएं  तो  चुप  लगा  रखिए

आएं  तब  ही  हुसैन  की  सफ़  में
जब  शहादत  का  माद्दा  रखिए  !

                                                                   (2016)

                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : वस्ल ; मिलन; मुनासिब : समुचित; रक़ीबों : प्रतिद्वंदियों; बज़्म : सभा, चर्चा करने का स्थान, संसद; क़ायदा : नियम; हसरतों : इच्छाओं; रू ब रू : प्रत्यक्ष, सम्मुख; निज़ाम : प्रशासन, सरकार; हुसैन : हज़रत इमाम हुसैन अ.स., कर्बला के न्याय युद्ध में जिन्हें यज़ीद की सेनाओं ने शहीद कर दिया था; सफ़ : नमाज़ पढ़ने के लिए लगाई जाने वाली पंक्ति; शहादत : बलिदान; माद्दा : क्षमता ।

बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

तिलिस्मे-आसमां....

जो  दानिशवर  परिंदों  की  ज़ुबां  को  जानते  हैं
यक़ीनन  वो   तिलिस्मे-आसमां    को  जानते  हैं

तू  कहता  रह  कि  तू  ख़ुद्दार  है  झुकता  नहीं  है
जहां   वाले     तेरे   हर  मेह्रबां    को  जानते  हैं

वही   बातें      वही   वादे       वही   बेरोज़गारी
वतन  के  नौजवां  सब  रहनुमां  को  जानते  हैं

कहां  नीयत  कहां  नज़रें  कहां  मंज़िल  सफ़र  की
सभी   रस्ते     अमीरे-कारवां     को  जानते  हैं

खिलेंगे  ख़ुद  ब  ख़ुद  दिल  में  किसी  दिन  आपके  भी
गुलो-.गुंचे    मुहब्बत   के   निशां     को  जानते  हैं

मेरी  आवाज़  पर  बंदिश  लगा  कर  देख  लीजे
फ़लक  तक  सब  मेरे  तर्ज़े-बयां  को  जानते  हैं

तेरे   अहकाम  पर  चलती  नहीं   मख़लूक़  तेरी
इलाही  !  हम  तेरे    दर्दे-निहां   को   जानते  हैं  !

                                                                                             (2016)

                                                                                      -सुरेश   स्वप्निल

शब्दार्थ: दानिशवर : विद्वान; परिंदों : पक्षियों; ज़ुबां : भाषा; यक़ीनन : निस्संदेह, विश्वासपूर्वक; तिलिस्मे-आसमां: आकाश की माया; ख़ुद्दार : स्वाभिमानी; जहां वाले : संसार के लोग; मेह्रबां : अनुग्रही; नौजवां : युवा; रहनुमां : नेताओं; नीयत : आशय; नज़रें : दृष्टि; मंज़िल : लक्ष्य; सफ़र : यात्रा; अमीरे-कारवां : यात्री समूह का नायक; गुलो-.गुंचे : फूल और कलियां; निशां : चिह्नों; आवाज़: स्वर; बंदिश : रोक, प्रतिबंध; तर्जे-बयां : कथन-शैली; अहकाम : आदेशों; मख़लूक़ : सृष्टि; इलाही : (हे) ईश्वर; दर्दे-निहां : गुप्त/आंतरिक पीड़ा ।

सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

जिन्हें नाज़ है ....

तुझे    मुर्शिदो-मुस्तफ़ा  भी  कहेंगे
जिन्हें  ग़र्ज़  है  वो  ख़ुदा  भी  कहेंगे

न  जाने  मेरे  दोस्त  क्या  चाहते  हैं
मुहब्बत   करेंगे    बुरा  भी   कहेंगे

मेरे   मेज़्बां  के   इरादे    ग़ज़ब  हैं
बुलाएंगे  घर  तख़्लिया  भी  कहेंगे

अभी   तक  तेरा  नंग  ही  सामने  है
सबूते-हया   दे    हया  भी   कहेंगे

हुकूमत  से  तेरी  नहीं  मुत्मईं  हम
जिन्हें  नाज़  है  वो  भला  भी  कहेंगे

ज़माने  के  दुःख-दर्द  को  गर  समझ  ले
तो  कुछ  और  दिल  के  सिवा  भी  कहेंगे
;
तू  जन्नत  की  ज़द  से  निकल  आए  तो  हम
तुझे  शौक़  से  दिलरुबा   भी  कहेंगे  !

                                                                             (2016)

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मुर्शिद : संत; मुस्तफ़ा: पैग़म्बर, ईश्वरीय दूत; ग़र्ज़ : स्वार्थ; मेज़बां : आतिथ्य कर्त्ता; तख़्लिया : एकांत;
नंग : निर्लज्जता; सबूते-हया : लज्जा का  प्रमाण; मुत्मईं : संतुष्ट, आश्वस्त; नाज़ : गर्व; गर : यदि; जन्नत : स्वर्ग;
ज़द : पकड़, पहुंच; शौक़ : रुचि; दिलरुबा : मनमोहक।