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बुधवार, 21 जून 2017

एक दिन मुक़र्रर हो...

शौक़  तो  उन्हें  भी  है  पास  में  बिठाने  का
जो  हुनर  नहीं  रखते  दूरियां   मिटाने  का

रोज़  रोज़  क्यूं  हम  भी  आपसे  पशेमां  हों
एक  दिन  मुक़र्रर  हो  रूठने-मनाने  का

आपकी  सफ़ाई  से  मुत्मईं  नहीं  हैं  हम
राज़  कोई  तो  होगा  आपके  न  आने  का

कस्रते-सियासत  हैं  दीनो-धर्म  के  झगड़े
ख़त्म   सिलसिला  कीजे  बस्तियां  जलाने  का

ख़ुदकुशी  के  सौ  सामां  शाह  ने  सजा  डाले
फ़र्ज़  अब  हमारा  है  मुल्क  को  बचाने  का

क्या  ख़बर  कि  दीवाने  कब-किसे  ख़ुदा  कर  लें
मर्ज़  है  मुरीदों  को  जूतियां  उठाने  का

जानते  नहीं  क्या  हम   आपकी  अदाओं  को
याद  बस  बहाना  है   अर्श  पर  बुलाने  का  !

                                                                                          (2017)

                                                                                    - सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हुनर: कौशल, पशेमां: लज्जित; मुक़र्रर: निश्चित; सफ़ाई: स्पष्टीकरण; मुत्मईं: संतुष्ट;  :रहस्य; कस्रते-सियासत: राजनीतिक उठा-पटक; सिलसिला: क्रम, चलन; ख़ुदकुशी: आत्म-हत्या; सामां: सामग्रियां; फ़र्ज़: ;कर्त्तव्य; मुल्क: देश; दीवाने: उन्मत्त जन; मर्ज़: रोग; मुरीदों: भक्त जन;  अदाओं: भंगिमाओं; अर्श: आकाश।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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