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शुक्रवार, 2 जून 2017

नौजवां लुट गया ...

तलाशे-मकां  में  जहां  लुट  गया
ज़मीं  के  लिए  आस्मां  लुट  गया

अदा  सादगी  शोख़ियां  पैरहन
न  जाने  दिवाना  कहां  लुट  गया

पसोपेश  में  रह  गईं  आंधियां
सफ़ीना  इसी  दरमियां  लुट  गया

मिला  शाह  हमको  ख़ुदादाद  ख़ां
कि  सदक़े  में  हर  नौजवां  लुट  गया

रिआया  तरसती  रही  रिज़्क़  को
सियासत  में  हिन्दोस्तां  लुट  गया

कहीं  तीरगी  को  ख़ुदा  मिल  गया
कहीं  रौशनी   का  मकां  लुट  गया

रहे-मग़फ़िरत  पर  चले  थे  मगर
मेरे  पीर  का  कारवां  लुट  गया  !

                                                                      (2017)

                                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तलाशे-मकां : घर की खोज; जहां: संसार, गृहस्थी; ज़मीं: पृथ्वी, इहलोक; आस्मां : आकाश, परलोक; अदा: भाव-भंगिमा; 
सादगी: सहजता, ऋजुता; शोख़ियां: चंचलता; पैरहन: वस्त्र-विन्यास; पसोपेश: दुविधा; सफ़ीना: नौका, जलयान; दरमियां: बीच, मध्य; ख़ुदादाद: ईश्वर दत्त, ईश्वर की देन; सदक़े: बलिहारी; रिआया: नागरिक गण; रिज़्क़: भोजन; सियासत: राजनीति; तीरगी: अंधकार; रौशनी: प्रकाश; रहे-मग़फ़िरत: मोक्ष का मार्ग; पीर: मार्गदर्शक, मनुष्य और ईश्वर का मध्यस्थ, आध्यात्मिक गुरु; कारवां: यात्री-दल।  

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-06-2017) को
    "प्रश्न खड़ा लाचार" (चर्चा अंक-2640)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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