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रविवार, 5 जनवरी 2014

...उठा लें दिल को !

आप  चाहें  तो  चुरा  लें  दिल  को
राज़दां  ख़ास  बना  लें   दिल  को

उफ़!  ये:  गुस्ताख़ियां  हसीनों  की
जां  बचाएं  के:  संभालें  दिल  को

ये:  तरीक़ा  अगर  मुनासिब  हो
आप  दिन-रात  उछालें  दिल  को

इश्क़  इतना  बुरा  नहीं  शायद
लोग  इक  बार  मना  लें  दिल  को

है  शहर  में  अदब  अभी  बाक़ी
राह  में  यूं  न  निकालें  दिल  को

है  यही  फ़र्ज़  भी,  शराफ़त  भी
बदगुमानी  से  बचा  लें  दिल  को

छोड़  आए  हैं  आपके  दर  पर
काम  आए  तो  उठा  लें  दिल  को !

                                                ( 2014 )

                                         -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: राज़दां: रहस्य जानने वाला; गुस्ताख़ियां: धृष्टताएं; मुनासिब: उचित; अदब: शिष्टाचार; बदगुमानी: कु-धारणाएं; दर: द्वार ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 08/01/2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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