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मंगलवार, 7 जनवरी 2014

ये: ज़िंदा दिली है..!

जिन्हें  दिल  लगाने  की  आदत  नहीं  है
उन्हें  भी    ग़मे-दिल  से   राहत  नहीं  है

वो:  नाहक़  हमें  अपना  दुश्मन  न  समझें
हमारी     किसी    से    अदावत  नहीं  है

बड़े  ख़ुश  हुए  आज  ये:  जान  कर  हम
के:  उनको  भी  हमसे  शिकायत  नहीं  है

तआनुक़  से   घबरा  गए    आप  यूं   ही
ये:   ताबिश-ए-ख़ूं    है     हरारत  नहीं  है

तुम्हें  अपने  दिल  में  बिठाएं  तो  कैसे
तुम्हारी     अदा   में     शराफ़त   नहीं  है

मेरे     मुस्कुराने    पे    नाराज़    क्यूं   हैं
ये:    ज़िंदा दिली    है     शरारत   नहीं  है

वो:  कैसा  ख़ुदा  है  के:  जिसकी  नज़र  में
फ़क़त      दुश्मनी     है   इनायत  नहीं  है  !

                                                              ( 2014 )

                                                       -सुरेश  स्वप्निल  

शब्दार्थ: ग़मे-दिल: हृदय की पीड़ा; नाहक़: व्यर्थ; अदावत: शत्रुता; तआनुक़: आलिंगन; 
ताबिश-ए-ख़ूं: रक्त की ऊष्णता; हरारत: ज्वर; शराफ़त: सभ्यता; ज़िंदा दिली: जीवंतता; फ़क़त: मात्र; इनायत: कृपा। 

4 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जले पर नमक - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. यहाँ आज पहली दफ़ा आए हैं,
    मगर लौट जाने की हसरत नहीं!
    यूँ बाँधा है हमको इन अशआर ने,
    चले जाएँ याँ से, ये जुरअत नहीं!!

    उत्तर देंहटाएं