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बुधवार, 25 मई 2016

अज़ीज़ों से गुज़ारिश

चुरा  कर  दिल  परेशां  हैं  यहां  रक्खें  वहां  रक्खें
हमीं  से  पूछ  लेते  हम  बता  देते  कहां  रक्खें

मनाएं  जश्न  अपनी  कामयाबी  का  मगर  पहले
ज़मीं  पर  पांव  रख  लें  तब  नज़र  में  आस्मां  रक्खें

अज़ीज़ों  से  गुज़ारिश  है  कि  जब  लें  फ़ैसला  ख़ुद  पर
हमारा  नाम  भी  अपने  ज़ेहन  में  मेह्रबां  रक्खें

ज़ईफ़ी  मस्'.अला  है  जिस्म  का  दिल  पर  असर  क्यूं  हो
मियां  जी ! कम  अज़  कम  अपने  ख़्यालों  को  जवां  रक्खें

जिन्हें  है  शौक़  मन  की  बात  दुनिया  को  सुनाने  का
मजालिस  से  मुख़ातिब  हों  तो  फूलों  सी  ज़ुबां  रक्खें

बने  हैं  जो  चमन  के  बाग़बां  यह  फ़र्ज़  है  उनका
बरस  में  दो  महीने  तो  बहारों  का  समां  रक्खें

फ़रिश्तों  को  बता  दीजे  कि  हम  तैयार  बैठे  हैं
हमारे  वास्ते  भी  अर्श  पर  ख़ाली  मकां  रक्खें  !

                                                                                                                (2016)

                                                                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : परेशां : चिंतित ; जश्न : समारोह ; कामयाबी : सफलता ; अज़ीज़ों : प्रिय जन ; गुज़ारिश : अनुरोध ; ज़ेहन : मस्तिष्क, ध्यान ; मेह्रबां : कृपालु ; ज़ईफ़ी : वृद्धावस्था ; मस्'.अला : समस्या ; जिस्म : शरीर ; अज़ :से ; मजालिस : सभाओं ; मुख़ातिब : संबोधित ; ज़ुबां :भाषा, शब्दावली ; चमन : उपवन ,देश ; बाग़बां : माली ;
फर्ज़ : कर्त्तव्य ; समां : वातावरण ; फ़रिश्तों : मृत्यु-दूतों ; अर्श : आकाश, परलोक ; ख़ाली : रिक्त ;  मकां : आवास ।


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-05-2016) को "कहाँ गये मन के कोमल भाव" (चर्चा अंक-2355) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. वेहतरीन ग़ज़ल । मुझे बहुत अच्छी लगी।

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