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सोमवार, 11 अप्रैल 2016

उसूल के पुर्ज़े ...

हज़ार  हर्फ़  ग़रीबों  पे  लाए  जाते  हैं
क़ुसूर  हो  न  हो  लेकिन  सताए  जाते  हैं

सियासतों  के  ज़ख़्म  सूखते  नहीं   फिर  भी
अवाम  हैं  कि  उमीदें  सजाए  जाते  हैं

जम्हूरियत  के  इदारों  की  बात  मत  कीजे
वहां  उसूल  के  पुर्ज़े  उड़ाए   जाते  हैं

रहे-सहर  में  अभी  और  भी  मराहिल  हैं
मगर  चराग़  हैं  कि  दिल  बुझाए  जाते  हैं

रक़ीब  हैं  तो  करें  जंग  सामने  आ  कर
यहां-वहां  से  धमकियां  दिलाए  जाते  हैं

ये  मैकदा  है  यहां  शैख़  की  नहीं  चलती
यहां  शराब  नहीं  ग़म  पिलाए  जाते  हैं

जिन्हें  मुरीद  बनाना  नहीं  हुआ  मुमकिन
वो  अब  फ़साद  में  ज़िंदा  जलाए  जाते  हैं  !

                                                                                             (2016)

                                                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हर्फ़ : कलंक; क़ुसूर : दोष ; सियासतों : राजनैतिक क्रिया-कलापों ; ज़ख़्म : घाव ; अवाम : जन-साधारण ; उमीदें : आशाएं ; जम्हूरियत : लोकतंत्र ; इदारों : संस्थाओं ; उसूल : सिद्धांतों ; पुर्ज़े : धज्जियां ; रहे-सहर : उषा का मार्ग ; मराहिल : विराम स्थल ; चराग़ : दीपक ; रक़ीब : शत्रु, प्रतिद्वंदी ; जंग : युद्ध ; मैकदा : मदिरालय ;   शैख़ : धर्मोपदेशक ; मुरीद : भक्त ; मुमकिन : संभव ; फ़साद : उपद्रव, दंगा ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (13-04-2016) को "मुँह के अंदर कुछ और" (चर्चा अंक-2311) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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