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बुधवार, 9 मार्च 2016

दिलबरी का मज़ा ...

हम  जो   भूले  से   मुस्कुराते  हैं
आप  दानिश्ता  दिल  जलाते  हैं

दिख  रहा  है  ख़ुलूस  आंखों  में
देखिए,   कब   क़रीब   आते  हैं

दिलबरी  का  मज़ा  यही  तो  है
दोस्त  ही  रात-दिन  सताते  हैं

दुश्मनों  की  निगाह  के  सदक़े
आजकल  रोज़   घर  बुलाते  हैं

वो  जो  सरकार  के  भरोसे  हैं
हर  क़दम  पर  फ़रेब  खाते  हैं

शोहद:-ए-शाह  के  बयां  सुन  कर
शह्र  दर  शह्र    कांप    जाते  हैं

आस्मां  भी  उन्हीं  की  सुनता  है
आस्मां  सर  पे  जो    उठाते  हैं  !

                                                                         (2016)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दानिश्ता: जान-बूझ कर; ख़ुलूस: अपनत्व ; दिलबरी: मनमोहक होना ; सदक़े : बलिहारी ; फ़रेब: छल ; शोहद:-ए-शाह: राजा के समर्थक, उपद्रवी ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 10 - 03 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2277 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. वो जो सरकार के भरोसे हैं
    हर क़दम पर फ़रेब खाते हैं

    शोहद:-ए-शाह के बयां सुन कर
    शह्र दर शह्र कांप जाते हैं

    आस्मां भी उन्हीं की सुनता है
    आस्मां सर पे जो उठाते हैं !

    उम्दा :)

    उत्तर देंहटाएं