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सोमवार, 7 मार्च 2016

नूर का इन्तेख़ाब ...

नूर  का    इन्तेख़ाब   कर  आए
क़ैस  का  घर  ख़राब  कर आए

चांद  की  शबनमी  शुआओं  को
छेड़  कर  सुर्ख़  आब  कर  आए

तोड़  डाला  हिजाब  महफ़िल  में
ज़ुल्म  वो:  बे-हिसाब  कर  आए

शाह जब मुल्क से मुख़ातिब  था
हम  उसे    बे-नक़ाब   कर  आए

घर   जला   कर  रहे-रिआया  में
ज़ीस्त्  को  कामयाब  कर  आए

ख़ुल्द  की   ख़ू  बिगाड़  दी  हमने
आशिक़ी  का   सवाब  कर  आए

काट  कर सर  रखा  मुसल्ले  पर
' लाह  को   लाजवाब   कर  आए  !

                                                                    (2016 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: नूर: प्रकाश; इन्तेख़ाब: चयन; क़ैस: लैला (यहां, काली रात) का प्रेमी, मजनूं ; शबनमी : ओस-जैसी; शुआओं: किरणों; 
सुर्ख़ आब : रक्तिम, लज्जा से लाल; हिजाब : मुखावरण ; महफ़िल : भरी सभा; ज़ुल्म : अन्याय ; मुल्क : देश, लोक; मुख़ातिब: संबोधित ; बे-नक़ाब : अनावृत ; रहे-रिआया: समाज के मार्ग, सामाजिक हित का मार्ग; ज़ीस्त : जीवन ; कामयाब : सफल ; ख़ुल्द:स्वर्ग; 
ख़ू : विशिष्टता, छबि; आशिक़ी : उत्कट प्रेम ; सवाब : पुण्य ; मुसल्ला : जाएनमाज़, नमाज़ पढ़ने के लिए बिछाया जाने वाला वस्त्र;
 'लाह : अल्लाह, विधाता, ब्रह्म ।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-03-2016) को "आठ मार्च-महिला दिवस" (चर्चा अंक-2276) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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