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बुधवार, 16 मार्च 2016

मौत की खाई ...

पढ़  लिया  लिख  लिया  सो  गए
ख़्वाब  में    वो:  ख़ुदा     हो   गए

कौन  हैं     लोग    जो    देस   में
नफ़्रतों     की  फ़सल     बो  गए

मौत  की     खाई  में     जा  गिरे
क़र्ज़  की     राह  पर     जो  गए

एक  दहक़ान     ही  तो       मरा
चार  पैसे          रखे       रो  गए

दाल  दिल    पर  हुई    बार   यूं
गंदुमी     ख़्वाब  भी     खो  गए

बज़्म  में      तीरगी      छा  गई
आप  ख़ुश  हैं  कि  हम  तो  गए

बंट  रही     थी    नियाज़े-करम
है  गवारा      जिन्हें      वो  गए  !

                                                                         (2016)

                                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: नफ़्रतों: घृणाओं ; क़र्ज़: ऋण ; दहक़ान: कृषक ; गंदुमी: गेहूं के वर्ण वाले ; बज़्म : सभा, गोष्ठी ; तीरगी : अंधकार ; 
नियाज़े-करम : मान्यता पूरी होने पर बांटी जाने वाली भिक्षा, भंडारा; गवारा : स्वीकार ।


3 टिप्‍पणियां:

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    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (18-03-2016) को "दुनिया चमक-दमक की" (चर्चाअंक - 2285) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

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