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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

...तू क़यामत कर

सब्र  कर  या   खुली  बग़ावत  कर
अपने एहसास  की  हिफ़ाज़त कर

शाह  से  दोस्ती  नहीं  मुमकिन
क्यूं  न  सच  बोल  कर  अदावत  कर

हो  रहे  दुश्मनी  हुकूमत  से
आज  हकदार  की  हिमायत  कर

ज़ुल्म  सहना  भी  ज़ुल्म  है  ख़ुद  पर
ज़ालिमों  के  ख़िलाफ़  हिम्मत  कर

सरज़मीने-सुख़न  तेरा  हक़  है
इस  जगह  सिर्फ़  बादशाहत  कर

रिज़्क़  छूते  नहीं  गदाई  का
तू  किसी  और  पर  इनायत  कर

देख,  हम  आस्मां  बनाते  हैं
अब  तेरा  ज़र्फ़, तू  क़यामत  कर !

                                                                           (2016)

                                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: सब्र: धैर्य; बग़ावत: विद्रोह; एहसास: संवेदना; हिफ़ाज़त: सुरक्षा; अदावत : शत्रुता; हुकूमत: शासन; हक़दार : न्याय संगत पात्र, अधिकारी; हिमायत : पक्षधरता; ज़ुल्म : अन्याय; ज़ालिमों : अन्यायियों; ख़िलाफ़: विरुद्ध; हिम्मत : साहस; सरज़मीने-सुख़न: सृजन-क्षेत्र, सृजन-संसार; बादशाहत : राज; रिज़्क़: भोजन; गदाई: भिक्षा-वृत्ति; इनायत : कृपा; आस्मां : आकाश, सृष्टि; ज़र्फ़: गंभीरता, सामर्थ्य; क़यामत : प्रलय ।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-02-2016) को "हँसता हरसिंगार" (चर्चा अंक-2245) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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