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शनिवार, 5 सितंबर 2015

अर्श से रोज़गार ...

गर  ख़ुदा  को   क़रार   आ  जाए
ख़ुल्द  में   भी   बहार   आ  जाए

ज़र्र:  ज़र्र:  हो   उन्स  से  रौशन
वो   सुब्ह    एक  बार   आ  जाए

चश्मे-जानां  में  ज़र्फ़  हो  इतना
देखते   ही     ख़ुमार     आ  जाए

आपकी   हर  अदा    मुबारक  हो
दुश्मनों  को भी  प्यार  आ  जाए

यूं   न  कीजे   निबाह    यारों  से
दोस्ती   में     दरार      आ  जाए

शाह की  तो नीयत  नहीं  दिखती
अर्श   से      रोज़गार     आ  जाए

हाथ  सर  पर  रखा  करें  मुहसिन
मुश्किलों    में    उतार   आ   जाए

पढ़     रहे   हैं    नमाज़    ग़ैरों  की
काश !  अपनी  पुकार   आ  जाए  !

                                                                      (2015)

                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: गर: यदि; क़रार: आत्म-तुष्टि, संतोष का भाव; ख़ुल्द: स्वर्ग;  ज़र्र:  ज़र्र: : कण-कण;  उन्स : स्नेह, आत्मीयता;  रौशन: उज्ज्वल, प्रकाशित;  चश्मे-जानां: प्रिय के चक्षु; ज़र्फ़: गहराई; ख़ुमार: उन्माद;  अदा: भंगिमा;     मुबारक : शुभ;  दरार: संध;  नीयत: प्रवृत्ति, रुचि;  अर्श: आकाश; मुहसिन: कृपालु, अनुग्रही; नमाज़: यहां जनाज़े की नमाज़;  ग़ैरों: दूसरों;  पुकार: बुलावा, मृत्यु का निमंत्रण।

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