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रविवार, 27 जुलाई 2014

ख़राबात है, मियां...!

तोड़  कर  दिल  मियां  चले  आए
छोड़  कर       दास्तां   चले   आए

क़ीमतें    यूं    बढ़ीं    ज़मीनों   की
हम      दरे-आसमां      चले  आए

था   कहीं    एक  घर    हमारा  भी
क्या   बताएं,     कहां    चले  आए

नींद  जब  ख़्वाब  के  सफ़र  में  थी
वो:    कहीं      दरम्यां     चले  आए

ईद    के     दिन      गले    लगाएंगे
सोच    कर      मेह्रबां    चले   आए

ये:    ख़राबात  है,    मियां  मोमिन
क्या  समझ  कर  यहां  चले  आए  ?

जल्दबाज़ी     नहीं    ख़ुदा  को    यूं
पर      मिरे     रहनुमां   चले  आए  !

                                                                            (2014)

                                                                     -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ:   दास्तां: आख्यान;  दरे-आसमां: ईश्वर के द्वार; दरम्यां: मध्य में; मेह्रबां: कृपालु;    ख़राबात: मदिरालय; मोमिन: धार्मिक, आस्तिक;   रहनुमां: पथ-प्रदर्शक, मृत्यु-दूत।

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 28 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  2. वाह क्या बात है। बहुत खूब

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