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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

क़ायम दुआ-सलाम रहे...!

गुनाहगारे-मुहब्बत  को  क्या  सज़ा  दीजे
गुनाह  ख़ास  नहीं,   ज़ेह्न   से  मिटा  दीजे

तमाम  लोग  बैठते  हैं  आपके  घर  में
हमीं  क़ुबूल  नहीं,  ठीक  है,  उठा  दीजे

मरीज़  ला-इलाज  है  सनमपरस्ती  का
दवा  नहीं,  ग़रीब  को  फ़क़त  दुआ  दीजे

दिले-रक़ीब  बदल  जाए  तो  बुरा  क्या  है
गले  लगा  के  ईद  पर  गिले  भुला  दीजे

ख़राब  दौर  में  क़ायम  दुआ-सलाम  रहे
ज़रा-सी  रस्म  है,  हो  जाए  तो  निभा  दीजे

हमें  उम्मीद  नहीं  शाह  से  वफ़ाओं  की
मगर  ये:  ज़ुल्म  है  कि  रात-दिन  दग़ा  दीजे

ख़ुदा  निगाह  करे  हाले-तिफ़्ले -ग़ाज़ा  पर
नमाज़े-शुक्र  में  अल्फ़ाज़  कुछ  बढ़ा  दीजे  !

                                                                             (2014)

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: गुनाहगार: अपराधी; ज़ेह्न: -मस्तिष्क; क़ुबूल: स्वीकार; सनमपरस्ती: प्रियतम-पूजा;  फ़क़त: मात्र; दिले-रक़ीब: प्रतिद्वंद्वी का हृदय;  दौर: समय-चक्र; वफ़ा: निर्वाह; दग़ा: छल; हाले-तिफ़्ले -ग़ाज़ा: फिलिस्तीनियों के अंतिम आश्रय-स्थल ग़ाज़ा-पट्टी में रहने वाले बच्चों के हाल; नमाज़े-शुक्र: ईद उल फ़ित्र में अल्लाह का शुक्रिया अदा करने के लिए पढ़ी जाने वाली नमाज़; अल्फ़ाज़: शब्द (बहुव.) । 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (26-07-2014) को ""क़ायम दुआ-सलाम रहे.." (चर्चा मंच-1686) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कल 27/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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