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शनिवार, 18 जनवरी 2014

महफ़िल की ख़लाओं से

हर    ज़ख़्म    सुलगता    है    यारों   की    दुआओं  से
पर    बाज़    नहीं    आते     कमबख़्त      जफ़ाओं  से

ईमां-ए-दुश्मनां        ने        उम्मीद      बचा     रक्खी
बेज़ार    हुए    जब-जब     अपनों     की   अनाऑ  से

क्यूं    शम्'अ    बुझाती    हैं  मुफ़लिस  के   घरौंदे  की
ये:      राज़      कोई      पूछे      गुस्ताख़     हवाओं  से

हम    दूर   आ    चुके    हैं    दुनिया    के    दायरों   से
आवाज़   न  अब    दीजे   महफ़िल   की   ख़लाओं  से

रहने   दे   ऐ   मुअज़्ज़िन   वो:   वक़्त    अलहदा   था
होता    था    उफ़क़    रौशन    जब   तेरी   सदाओं  से

गिन-गिन    के    रोटियां   हैं,   राशन    है   शराबों  पे
घर  क्या  बुरा  था  हमको   जन्नत  की    फ़ज़ाओं  से

मस्जिद  का  मुंह  न  देखा   मुश्किल  पड़ी  जो  हमपे
क्या    ख़ाक     दुआ    मांगें    पत्थर   के   ख़ुदाऑ  से  !

                                                                                ( 2014 )

                                                                            -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: ज़ख़्म: घाव;  कमबख़्त: अभागे; जफ़ाओं: अन्यायों, अत्याचारों; बेज़ार: दु:खी; अनाओं: अहंकारों; मुफ़लिस: विपन्न, निर्धन; गुस्ताख़: उद्दण्ड;  महफ़िल की ख़लाओं: सभा के एकांतों; मुअज़्ज़िन: अज़ान देने वाला;  अलहदा: भिन्न, अलग; उफ़क़: क्षितिज; 
रौशन: प्रकाशमान;  फ़ज़ाओं: शोभाओं, रंगीनियों। 

5 टिप्‍पणियां:

  1. काफी उम्दा प्रस्तुति.....
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-01-2014) को "तलाश एक कोने की...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1497" पर भी रहेगी...!!!
    - मिश्रा राहुल

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  2. ***आपने लिखा***मैंने पढ़ा***इसे सभी पढ़ें***इस लिये आप की ये रचना दिनांक 20/01/2014 को नयी पुरानी हलचल पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...आप भी आना औरों को भी बतलाना हलचल में सभी का स्वागत है।


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