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सोमवार, 20 जनवरी 2014

...ये: मुद्द'आ नहीं है !

दिल  दें  न  दें  हमें  वो:  ये:  मुद्द'आ  नहीं  है
लेकिन  नज़र  में  उनकी  शायद  वफ़ा  नहीं  है

क्या  ढूंढते   हैं   यां-वां  जो  चाहिए   बता  दें
हालांकि  हमको  दिल  का  ख़ुद  भी  पता  नहीं  है

दिन-रात  तड़पने  की  कोई  वजह  बताएं
यूं  दरमियां  हमारे  कुछ  भी  हुआ  नहीं  है

है  कौन  दुश्मने-दिल  अल्लाह  देख  लेगा
काफ़िर  हैं  जिनके  लब  पे  कोई  दुआ  नहीं  है

ऐसे  भी  लोग  हम  पर  तन्क़ीद  कर  रहे  हैं
इल्मे-सुख़न  से  जिनका  कुछ  वास्ता  नहीं  है

दिल  तोड़ने  का  सबको  हक़  तो  ज़रूर  है  पर
इस  जुर्म  के  मुताबिक़  कोई  सज़ा  नहीं  है

आज़ारे-दिल  के  आगे  अल्लाह  भी  है  बेबस
पढ़ते  हैं  सब  नमाज़ें  लेकिन  शिफ़ा  नहीं  है !

                                                                ( 2014 )

                                                         - सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: मुद्द'आ: बिंदु, विषय; वफ़ा: ईमानदारी; यां-वां: यहां-वहां; दरमियां: बीच  में; हृदय का शत्रु; काफ़िर:नास्तिक; तन्क़ीद: टिप्पणी, समीक्षा; इल्मे-सुख़न: सृजन-कला; मुताबिक़: अनुरूप; आज़ारे-दिल: हृदय-रोग, प्रेम-रोग; शिफ़ा: आरोग्य्

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