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शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

ख़ुदा ख़िलाफ़ रहे ...

हुए  हैं  हम  शिकार  जबसे  उसके  अहसां  के
उठा    रहे     हैं  नाज़     बे- शुमार  मेहमां  के

है    फ़िक्रे-दोस्ती    तो   क्यूं  न  हो  गए  मेरे
मिज़ाज    पूछते   हैं    अब   दिले-पशेमां  के

अना   संभाल   के   उड़ते   गए    ख़यालों  में
न  महफ़िलों  के   रहे   और  न    बियाबां के

जहां  में  नाम  है   जिनका   हरामख़ोरी   में
सुबूत   मांग   रहे  हैं    वो:    हमसे  ईमां  के

वक़्त  जाता  है  तो  आंसू  भी  पलट  जाते  हैं
ख़ुदा   ख़िलाफ़    रहे  या  न    रहे  इन्सां  के

करेंगे  लाख  जतन   वो:  शम्अ  बुझाने  के
ख़याल   नेक  नहीं    आज  अहले-तूफ़ां  के

ख़ुदा  भी     देख   रहा  है    इनायतें  उनकी
बने  हुए  हैं  जो  दुश्मन  हमारे  अरमां  के !

                                                            ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: नाज़: नख़रे; बे-शुमार: अगणित; फ़िक्रे-दोस्ती: मित्रता की चिंता; मिज़ाज: हाल-चाल; दिले-पशेमां: लज्जित हृदय; अना: अहंकार;  महफ़िलों: सभा, गोष्ठी; बियाबां: उजाड़, निर्जन प्रदेश; अहले-तूफ़ां: झंझावात के साथी; इनायतें: कृपाएं; अरमां: अभिलाषा। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [21.10.2013]
    चर्चामंच 1405 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |

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