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रविवार, 22 सितंबर 2013

सनम न जाएं कहीं !

दूर  हमसे    सनम    न  जाएं  कहीं
खा  के  झूठी  क़सम  न  जाएं  कहीं

मंज़िलें    अब    मेरी  नज़र    में  हैं
छोड़  कर  हमक़दम  न  जाएं  कहीं

सांस   आती   है     सांस   जाती  है
ज़िंदगी  के    भरम   न  जाएं  कहीं

कर  रहे  हैं   वो:    बात    जाने  की
ख़्वाब  मेरे   सहम   न  जाएं  कहीं

आह  निकले   के:  मौत   आ  जाए
दर्द   सीने  में   जम  न  जाएं  कहीं

देख  कर  हुस्न   उस   परीवश  का
वक़्त  के  पांव  थम  न  जाएं  कहीं

दोस्ती   का      पयाम     आया  है
अपने  दीनो-धरम  न  जाएं  कहीं !

                                                 ( 2013 )

                                          -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हमक़दम: पग-पग के साथी; भरम: भ्रम; परीवश: परियों जैसे चेहरे वाला;   पयाम: संदेश।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 25/09/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी. आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है भैया ।

    सादर

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  3. बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है भैया ।

    सादर

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  4. बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है भैया ।

    सादर

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  5. बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है भैया ।

    सादर

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