Translate

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

फ़राइज़-ए-रमज़ान

मुहब्बत  से  दिल  को  बचाना  पड़ेगा
हसीनों    से    पीछा     छुड़ाना  पड़ेगा

इलाजे-ग़मे-दिल  को  जाएं  कहां  हम
हकीमों   को   क़िस्सा   सुनाना  पड़ेगा

मेरी    बंदगी     उनको    भारी   पड़ेगी
गिरा   तो   उन्हीं   को    उठाना  पड़ेगा

बड़े  आए   आशिक़   मुहब्बत  जताने
ख़बर भी  है  क्या-क्या  लुटाना  पड़ेगा

न  खोलेंगे  वो: आज दरवाज़े  दिल  के
हमें     ज़ोर   से      खटखटाना  पड़ेगा

इबादत   में   अल्ल:  वफ़ा   चाहता  है
तो  ज़ाहिर  है    ईमान   लाना   पड़ेगा

फ़राइज़-ए-रमज़ान   आसां    न  होंगे
के: मस्जिद में हर  रोज़  जाना  पड़ेगा !

                                                     ( 2013 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: इलाजे-ग़मे-दिल: हृदय के दु:खों का उपचार; बंदगी: भक्ति; फ़राइज़-ए-रमज़ान: रमज़ान के कर्त्तव्य।


5 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए शनिवार 06/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. इबादत में अल्ल: वफ़ा चाहता है
    तो ज़ाहिर है ईमान लाना पड़ेगा
    वाह..
    बेहतरीन ग़ज़ल..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. IBAADAT ME ALLAH VAFA CHAHTA HAI,VAFA KO HI DIL ME BITHANA PADEGA.....ACHCHHI GAZAL HAI ........J N MISHRA.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही बेहतरीन गजल...
    बहुत खूब ..
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. बड़े आए आशिक़ मुहब्बत जताने
    ख़बर भी है क्या-क्या लुटाना पड़ेगा
    इबादत में अल्ल: वफ़ा चाहता है
    तो ज़ाहिर है ईमान लाना पड़ेगा
    खूबसूरत ग़ज़ल

    उत्तर देंहटाएं