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रविवार, 21 जुलाई 2013

रोज़ेदारी का जज़्बा

आपको  बिन  कहे  दिल  में  आना  न  था
आ   गए   तो    कहीं  और    जाना  न  था

दोस्तों    की    ज़रूरत     नहीं   तो   तुम्हें
हाथ    मेरी    तरफ़    यूं     बढ़ाना  न  था

छोड़   के    जो   गए    दुश्मनों  की  तरह
लौट  के  ख़्वाब  में   फिर  सताना  न  था

ख़्वाहमख़्वाह  रात  भर  जी  जलाते  रहे
उनके    वादे   पे    ईमान    लाना  न  था

तिश्नगी  जब   सहन  ही   नहीं  तो  तुम्हें
रोज़ेदारी    का    जज़्बा   दिखाना  न  था !

                                                         ( 2013 )

                                                  -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: ख़्वाहमख़्वाह: अकारण, व्यर्थ;   ईमान: आस्था; तिश्नगी: प्यास; रोज़ेदारी: निर्जल उपवास; जज़्बा: भावना, उत्साह।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर |
    http://srishtiekkalpana.blogspot.in

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  2. bahut sunder abhibaykti jo prem ko bahuaayami rupon mein arth deti hai.kavi ka yeh kahna ki aa gaye dil mein to jana na tha aur dosti manjur na thi to hath dosti ka bdhana na tha khud yek jivan darshan hai jo alakch bibhu ka pata deta hai.bahut hi sunder aur chintan dhara ko disha deti kavita.

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  3. agar darwaza dil ka band kar lete to shayad ham nahi aate
    ( jab ham aa hee gaye the tab )
    agar darwaza dil ka band kar lete to shayad ham nahi jaate
    khata ye aapki thi jo ki darwaza khula rakhkha.
    .....................................j.n.mishra-9425603364

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जानिए क्या कहती है आप की प्रोफ़ाइल फोटो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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