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रविवार, 3 मार्च 2013

तू है ख़ुदा तो...

तेरी  नवाज़िशों  पे   हमें   फ़ख़्र     क्यूं  न  हो
तू  है  ख़ुदा  तो  दो जहां  में  ज़िक्र क्यूं  न  हो

आज़ार-ए-दिल बढ़ा गए नज़रें  मिला  के: वो:
इस   कीमियागरी   पे    हमें  उज्र  क्यूं  न  हो

तेरी  हर  एक  बात  पे    करते  हैं   हम  यक़ीं
तेरी  अदा  में  गो  फ़रेब-ओ-मक्र  क्यूं  न  हो 

सज्दे  में  इसलिए  हैं    के: सालिम  रहे  ईमां
होना  है    बग़लगीर  वहां,     सब्र  क्यूं  न  हो

कहता  हूं   और  कहता  रहूंगा  मैं    'अनलहक़'
फिर  हज़रत-ए-मंसूर  सा  ही  हश्र  क्यूं  न  हो।

                                                               ( 2013 )

                                                        -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: नवाज़िश: प्रतिदान, देन; फ़ख़्र: गर्व; ज़िक्र: उल्लेख; आज़ार-ए-दिल: दिल  की  बीमारी; 
             कीमियागरी: रसायन-चिकित्सा; उज्र: आपत्ति; सालिम: परिपूर्ण; ईमां: आस्था;  
             बग़लगीर: पार्श्व में खड़े होना ; सब्र: धैर्य;  'अनलहक़': 'अहं ब्रह्मास्मि', 'मैं ही ख़ुदा  हूं';
             हश्र: परिणति।

1 टिप्पणी:



  1. ☆★☆★☆




    आदरणीय सुरेश स्वप्निल जी
    कमाल के शायर हैं जनाब आप तो...
    इतनी देर से आपकी ग़ज़लियात में ही डूबा हूं ...
    जितना पढ़ा, सब उम्दा !
    :)
    इस ग़ज़ल का यह शे'र बेहद पसंद आया-
    कहता हूं और कहता रहूंगा मैं 'अनलहक़'
    फिर हज़रत-ए-मंसूर सा ही हश्र क्यूं न हो

    भई वाह !!
    हार्दिक बधाई !


    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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