Translate

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

निगाहे-मोहसिन ...

जो  आशिक़ों  की क़दर  न  होगी
क़ज़ा  से   पहले    मेहर  न  होगी

रहें  अगर  वो:  क़रीब  दिल  के
ख़ुशी  कभी  मुख़्तसर  न  होगी

बसे  हैं  दिल  में  तो  बे-ख़बर  हैं
उजड़  गए  तो    ख़बर  न  होगी 

अभी   हया   के   सुरूर  में   हैं
निगाहे-मोहसिन  इधर  न  होगी

बहिश्त  जा  कर  भी  देख  लीजे
बिना  हमारे    गुज़र      न  होगी

दिले-ख़ुदा  में  जगह  न  हो  तो
कोई  दुआ    कारगर   न   होगी

न  देंगे  गर  हम  अज़ान  दिल  से
यक़ीन  कीजे  सहर  न  होगी  !

                                                                     (2016)

                                                             -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: क़दर: सम्मान ; क़ज़ा : मृत्यु; मेहर : ईश्वरीय कृपा; मुख़्तसर : संक्षिप्त ; हया : लज्जा; सुरूर: मद ; निगाहे-मोहसिन :अनुग्रह करने वाले की दृष्टि; बहिश्त: स्वर्ग; गुज़र: निर्वाह; दुआ: प्रार्थना; कारगर: प्रभावी;
सहर: उष:।




4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (21-07-2016) को "खिलता सुमन गुलाब" (चर्चा अंक-2410) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं