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रविवार, 1 मई 2016

हक़ मांग मजूरा !

हक़  मांग  मजूरा !  हिम्मत  कर
ख़ुद्दार  किसाना  !  हिम्मत  कर
हक़दार  जवाना  !  हिम्मत  कर

जो  ख़ामोशी  से  जीते  हैं 
हक़  उनका  मारा  जाता  है
उनके  ही  ख़ून-पसीने  से 
हर  क़स्र  संवारा  जाता  है
उनके  अश्कों  से  दुनिया  का 
हर  रंग  निखारा  जाता  है
उनके  हक़  से  सरमाए  का 
हर  क़र्ज़  उतारा  जाता  है

हक़  मांग  मजूरा  !  ज़िद  कर  ले
बेज़ार  किसाना  !  ज़िद  कर  ले
दमदार  जवाना  !  ज़िद  कर  ले

उठ  लाल  फरारी  ले  कर  चल
फिर  ज़िम्मेदारी  ले  कर  चल
सारी  दुश्वारी  ले  कर  चल
सर  पर  सरदारी  ले  कर  चल
पूरी  तैयारी  ले  कर  चल

ज़ुल्मत  की  आंधी  के  आगे 
सर  और  नहीं  झुकने  देना
यह  सफ़र  बग़ावत  का,  हक़  का 
हरगिज़  न  कहीं   रुकने  देना

दुनिया  का  रंग  बदलना  है
मंज़िल  पा  कर  ही  दम  लेना

उठ,  जाग  मजूरा !  हिम्मत  कर
मज़्लूम  किसाना  !  हिम्मत  कर 
नाकाम  जवाना  !  हिम्मत  कर

हक़  मांग ! कि  तेरी  बारी  है  !

                                                                                       (2016)

                                                                                 -सुरेश  स्वप्निल

              







4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-05-2016) को "हक़ मांग मजूरा" (चर्चा अंक-2330) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    श्रमिक दिवस की
    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " मजदूर दिवस, बाल श्रम, आप और हम " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. हकीकत है हक की लड़ाई।

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  4. हकीकत है हक की लड़ाई।

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