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मंगलवार, 8 सितंबर 2015

दिल की दवा....

जहां  हमने  उमीदों  की  शम्.अ   दी
सितारों  ने  वहीं  अपनी  अना  रख  दी

कभी  हम  बेक़रारी  में  न  सो  पाए
सर्हाने  पर  बुज़ुर्गों  ने  दुआ  रख  दी

ख़ुदा  ने   आशिक़ों  की  बद्दुआ  ले  ली
फ़रिश्तों में  अदा  रख  दी  जफा  रख  दी

सफ़र  में  याद  आएगी  हमारी  भी
सरो-सामान  में  हमने  वफ़ा  रख  दी

मुदावा  ये  किया  उसने  सुफ़ैदी  का
हमारे  सामने  दिल  की  दवा   रख  दी

तरक़्क़ी  के  सभी  मा'ने  बदल  डाले
मिटा  कर  शाह  ने  आबो-हवा  रख  दी 

बरहना  हैं  सरे-महफ़िल  सभी  रहबर
छुपा  कर  होशियारों  ने  हया  रख  दी !



                                                                                      (2015)

                                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: उमीदों: आशाओं; शम्.अ: दीपिका; सितारों: ग्रह-नक्षत्रों;  अना: घमंड;  बेक़रारी: व्याकुलता; सर्हाने: सिरहाने, सिर की ओर; बुज़ुर्गो: पूर्वजों; आशिक़ों: प्रेमियों; बद्दुआ: अ-शुभकामना; फ़रिश्तों: परियों; अदा: भाव-भंगिमा; जफा: निष्ठाहीनता; सरो-सामान: आवश्यक सामग्री; वफ़ा: निष्ठा;  मुदावा : उपचार; सुफ़ैदी: केशों की शुभ्रता, वृद्धावस्था; तरक़्क़ी: प्रगति, विकास;  मा'ने: अर्थ, संदर्भ;  आबो-हवा: पर्यावरण, बरहना: निर्वस्त्र; सरे-महफ़िल: भरी सभा में, रहबर: मार्गदर्शक, नेता गण; होशियारों: चतुर-सुजानों;  हया: लज्जा । 





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