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गुरुवार, 26 मार्च 2015

नामो-निशां से गए !

आप  तो  सिर्फ़  अपनी  ज़ुबां  से  गए
रोज़   दो-चार   दहक़ान    जां  से  गए

है  अज़ल  से  यही  इश्क़  का  क़ायदा
बदगुमां   जो  हुए,  दो - जहां  से   गए 

लुट गए लोग  हमसे मिला कर  नज़र
दीद:वर    अपने    तीरो-कमां  से  गए 

चाहती   हैं     बहारें    हमें    इस  क़दर
फूल   खिलते  गए   हम  जहां  से  गए

कोई किरदार दिल तक न पहुंचा  कभी
आप    जबसे    मिरी   दास्तां   से  गए

आपके   नूर   की     बारिशें    जब  हुईं
सैकड़ों   ग़म    हमारे   मकां     से  गए

रैयतें    जब  कभी   होश  में    आ  गईं 
ज़ारो-फ़र् औन   नामो-निशां  से  गए !

                                                                       (2015)

                                                              -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ:  ज़ुबां: वचन;  दहक़ान: कृषक (बहुव.);  जां: प्राण;  अज़ल: अनादिकाल;  क़ायदा: नियम;  बदगुमां: दिग्भ्रमित;  दो-जहां: इहलोक-परलोक;  दीद:वर: आंख वाले, दृष्टि से वार करने वाले;  तीरो-कमां: तीर-कमान;  किरदार: (कथा का) पात्र, चरित्र; दास्तां: कथा, आख्यान; नूर: प्रकाश;  मकां: गृह; रैयतें: प्रजा (बहुव.); ज़ारो-फ़र् औन:ज़ार और फ़र् औन, ज़ार रूस के और फ़र् औन मिस्र के प्राचीन, निरंकुश और अत्याचारी शासक; नामो-निशां: स्मृति-चिह्न । 

3 टिप्‍पणियां:

  1. नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (28-03-2015) को "जहां पेड़ है वहाँ घर है" {चर्चा - 1931} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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