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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

ये दौरे-दहशत...

न  दिल  रहेगा, न  जां  रहेगी
रहेगी      तो     दास्तां  रहेगी

है  वक़्त  अब  भी  निबाह  कर  लें
तो  ज़िंदगी  मेह्रबां  रहेगी

तुम्हारे  आमाल  तय  करेंगे
कि  रूह  आख़िर  कहां  रहेगी

थमा  सफ़र  जो  कभी  हमारा
ग़ज़ल  हमारी  रवां  रहेगी

मिरे  मकां  का  तवाफ़  करना
कि  हर  तमन्ना  जवां  रहेगी

ये  दौरे-दहशत  तवील  होगा
जो  चुप  अभी  भी  ज़ुबां  रहेगी

उड़ेगी  जब  ख़ाक  ज़र्रा-ज़र्रा
फ़िज़ा  में  अपनी   अज़ाँ  रहेगी !

                                                         (2014)

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: दास्तां: आख्यान, कथा; निबाह: निर्वाह; मेह्रबां: कृपालु; आमाल: आचरण; रवां: प्रवाहमान; मकां: समाधि, क़ब्र; तवाफ़: परिक्रमा; तमन्ना: अभिलाषा; जवां: युवा; दौरे-दहशत: आतंक का समय; तवील: विस्तृत; ज़ुबां: जिव्हा; ख़ाक: चिता की भस्म; ज़र्रा-ज़र्रा: कण-कण; फ़िज़ा: वातावरण । 

1 टिप्पणी:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-12-2014) को "वास्तविक भारत 'रत्नों' की पहचान जरुरी" (चर्चा अंक-1840) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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