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शनिवार, 22 नवंबर 2014

जब कोह पिघल जाएंगे !

ख़्वाब  जिस  रोज़  परिंदों  में  बदल  जाएंगे
वक़्त  के  हाथ  से  कुछ  लोग  निकल  जाएंगे

तुम  उठे  भी    तो   बार-बार    लड़खड़ाओगे
हम  गिरे  भी  तो  किसी  रोज़  संभल  जाएंगे

हम  यहां  वस्ल  की  उम्मीद  सजा  बैठे  थे
क्या  ख़बर  थी  कि  कभी  आप  फिसल  जाएंगे

इम्तिहां  लें  न  कभी  आप  हमारी  ख़ू  का
खेल  ही  खेल  में  अरमान  मचल  जाएंगे

शाह   दिन-रात   सब्ज़बाग़   दिखाना  छोड़े
लोग   नादान   नहीं   हैं   कि  बहल  जाएंगे

क़त्लो-ग़ारत  के  इरादों  को  हवा  मत  दीजे
इस  सियासत  से  चमनज़ार  दहल  जाएंगे

हर  तरफ़  दरिय:-ए-उम्मीद  नज़र  आएगा
आतिशे-इश्क़  से  जब  कोह  पिघल  जाएंगे !

                                                                            (2014)

                                                                  -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: परिंदों: पक्षियों; वस्ल: मिलन; ख़ू: प्रकृति, स्वभाव; सब्ज़बाग़: झूठे स्वप्न; नादान: अबोध; क़त्लो-ग़ारत: हत्या और रक्तपात; सियासत: राजनीति, षड्यंत्र; चमनज़ार: हरे-भरे उद्यान; दरिय:-ए-उम्मीद: आशा की नदियां; आतिशे-इश्क़: प्रेमाग्नि; कोह: पर्वत ।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (23-11-2014) को "काठी का दर्द" (चर्चा मंच 1806) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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