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रविवार, 17 अगस्त 2014

समंदर जानता है !

वो  हमें  अच्छी  तरह  पहचानता  है
मानि-ए-वुस'अत  समंदर  जानता  है

राह  आसां  छोड़  कर  रूहानियत  की
ख़ाक  दर-दर  की  दिवाना  छानता  है

मै  बुरी  शै  है,  हमें  भी  इल्म  है  ये
ज़ाहिदों ! दिल  कब  नसीहत  मानता  है ?

लद   गए  दिन  अब  तुम्हारी  शायरी  के
कौन  अब  ग़ालिब,  तुम्हें  पहचानता  है ?

क्या  उसे  दिल  खोल  कर  दिखलाइएगा
गर  ख़ुदा  है  तो  हक़ीक़त  जानता  है  !

                                                                        (2014)

                                                                              -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मानि-ए-वुस'अत: विस्तार का अर्थ; रूहानियत: आध्यात्म; मै: मदिरा; शै: वस्तु; इल्म: बोध; ज़ाहिदों: धर्मोपदेशकों; नसीहत: सीख; ग़ालिब: हज़रत मिर्ज़ा ग़ालिब, उर्दू के महान शायर; गर: यदि; हक़ीक़त: वास्तविकता।

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 18 . 8 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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