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रविवार, 9 फ़रवरी 2014

बंदगी की वजह ...

कोई  हमको  तरह  नहीं  देता
बज़्म  में  ही  जगह  नहीं  देता

ख़ुश  रहें  लोग  नींद  आने  तक
वक़्त  ऐसी  सुबह  नहीं  देता

ख़ूब  तूने  मिज़ाज  पाया  है
जान  दे  दो,  निगह  नहीं  देता

लोग  ख़ुदग़र्ज़  हो  गए  कितने
कोई  दूजे  को  रह  नहीं  देता

शुक्र  है,  तुझमें  ज़र्फ़  बाक़ी  है
हमको  दीवाना  कह  नहीं  देता

सब  रियाया  की  जां  के  पीछे  हैं
शाह  को  कोई  शह  नहीं  देता

क्यूं  ख़ुदा  हम  कहें  उसे  कहिए
बंदगी  की  वजह  नहीं  देता  !

                                               ( 2014 )

                                        -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: तरह: उचित सम्मान, शे'र की पंक्ति; बज़्म: गोष्ठी; मिज़ाज: स्वभाव; निगह: दृष्टि, निगाह का संक्षिप्त; 
ख़ुदग़र्ज़: स्वार्थी; रह: मार्ग, राह का संक्षेप; ज़र्फ़: गहराई, धैर्य; रियाया: जनता; शह: चुनौती; बंदगी: भक्ति। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. ***आपने लिखा***मैंने पढ़ा***इसे सभी पढ़ें***इस लिये आप की ये रचना दिनांक 10/02/2014 यानी आने वाले इस सौमवार को को नयी पुरानी हलचल पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...आप भी आना औरों को भी बतलाना हलचल में सभी का स्वागत है।


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