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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

वो: महजबीं न आएगा ..!

मेरे  बयां  पे  किसी  को  यक़ीं  न  आएगा
अगर  अज़ां  पे  मेरी  वो:  हसीं  न  आएगा

कोई  बताए  कि  ऐसी  बहार  क्या  कीजे
शवाब  पर  जो  गुले-आतशीं  न  आएगा

अभी  है  वक़्त  दिल  का  लेन-देन  कर  लीजे
क़रीब  वर्न:  कोई  दिलनशीं  न  आएगा

हमारे  बीच  के  रिश्ते  में  रूहदारी  है 
यहां  ख़याले-दिले-नुक़्त:चीं  न  आएगा

ये:  चांद  रात  भी  क़ुबूल  नहीं  है  हमको
नज़र  जो  बाम  पे  वो:  महजबीं  न  आएगा

अजब  है  रंग  मेरे  यार  की  वफ़ाओं  का
जहां  बुलाओ  उसे  बस  वहीं  न  आएगा

मेरी  ग़ज़ल  पे लाख  मरहबा  कहे  दुनिया
तेरी  ज़ुबां  पे  लफ़्ज़े-आफ़्रीं  न  आएगा  !

तेरी  तलाश  में  हम  उस  मक़ाम  तक  पहुंचे
जहां  पे  कोई  भी  अह् ले-ज़मीं  न  आएगा  !

                                                                 ( 2014 )

                                                          -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: बयां: वक्तव्य, बयान का लघु; शवाब: पूर्ण यौवन; गुले-आतशीं: आग जैसे लाल रंग वाला बारहमासी गुलाब का फूल; 
दिलनशीं: हृदय को लुभाने वाला; रूहदारी: आत्मिकता, आध्यात्मिकता; ख़याले-दिले-नुक़्त:चीं: छिद्रान्वेषी हृदय का विचार; बाम: झरोखा; महजबीं: चंद्रभाल; मरहबा: साधु-साधु; लफ़्ज़े-आफ़्रीं: वाह-वाह, प्रशंसा का शब्द; मक़ाम: स्थल; अह् ले-ज़मीं: पृथ्वी-वासी।

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