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गुरुवार, 2 जनवरी 2014

...दुआएं कम हैं !

जो  इब्तिदा  में  ही  चश्म  नम  हैं
तो   आइंद:   भी   कई   सितम  हैं

सनम  अगर  हैं    हमारे  दिल  में
तो उनकी नज़्रों में हम ही  हम  हैं

ख़फ़ा  अगर  हों  तो  जान  ले  लें
हुज़ूर    यूं   तो    बहुत   नरम  हैं

इधर  हैं    तूफ़ां    उधर  तजल्ली
मेरे   मकां   पे    बड़े     करम  हैं

ज़ुबां   खुले   तो  सलीब  तय  है
मगर  वफ़ा  पे   दुआएं  कम  हैं

हमीं   ख़ुदा  को   सफ़ाई  क्यूं  दें
हमें  भी   उनपे   कई   वहम  हैं

यहां  का  सज्दा  वहां  न  कीजो
ख़ुदा,  ख़ुदा  हैं;  सनम,  सनम  हैं !

                                                    ( 2014 )

                                              -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: इब्तिदा: आरंभ; चश्म नम: आंखें भीगी; आइंद:: आगे चल कर; सितम: अत्याचार; सनम: प्रिय; नज़्रों: दृष्टि; ख़फ़ा: रुष्ट; हुज़ूर: श्रीमान, मालिक, ईश्वर; तूफ़ां: झंझावात; तजल्ली: आध्यात्म का प्रकाश; मकां: आवास, समाधि, क़ब्र; ज़ुबां: जिव्हा; सलीब: सूली; 
वफ़ा: निर्वाह, आस्था; दुआएं: शुभकामनाएं; वहम: संदेह, आशंकाएं; सज्दा: भूमि पर शीश नवाना।


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (4-1-2014) "क्यों मौन मानवता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1482 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  2. यहां का सज्दा वहां न कीजो
    ख़ुदा, ख़ुदा हैं; सनम, सनम हैं !
    आभार,,,,,,,बहुत सुन्दर ..

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  3. यहां का सज्दा वहां न कीजो
    ख़ुदा, ख़ुदा हैं; सनम, सनम हैं !
    बहुत सुन्दर !
    नया वर्ष २०१४ मंगलमय हो |सुख ,शांति ,स्वास्थ्यकर हो |कल्याणकारी हो |
    नई पोस्ट विचित्र प्रकृति
    नई पोस्ट नया वर्ष !

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