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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

वो: सुबह दीजिए...!'

दोस्तों  आज  हमको  तरह  दीजिए
शाइरी  की  मुनासिब  वजह  दीजिए

मिसर:-ए-उन्सियत  दे  दिया  आपको
आप  ही  ख़ूबसूरत  गिरह  दीजिए

मर  न  जाएं  कहीं  हिज्र  में  आपके
दीजिए  तो  दुआ  बेतरह  दीजिए

तज़्किराते-मसाइल-ए-इंसां  में  अब
जज़्ब:-ए-फ़ाक़ाकश  को  जगह  दीजिए

रौशनी  जिसकी  क़ायम  अज़ल  तक  रहे
ज़िंदगी  को  कभी  वो:  सुबह  दीजिए

ज़ात-ओ-मज़्हब  के  हर  दायरे  से  परे
रहबरों  को  नई  इक  निगह  दीजिए

जल्व:गर  हो  न  जाएं  सरे-बज़्म  वो:
नज़्रे-मैकश  को  ज़र्फ़े-क़दह  दीजिए  !

                                                         ( 2013 )

                                                   -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: तरह: शे'र की एक  पंक्ति, ऐसी पंक्ति जिस पर शे'र कहा जा सके; मुनासिब  वजह: उचित  कारण; मिसर:-ए-उन्सियत: स्नेह-पूर्ण पंक्ति; गिरह: शे'र की दूसरी पंक्ति, ऐसी पंक्ति जिसे सम्मिलित करके शे'र पूरा हो सके; हिज्र: अनुपस्थिति, वियोग; दुआ: शुभकामना; 
बेतरह: जम कर, बहुत अधिक; तज़्किराते-मसाइल-ए-इंसां: मनुष्य की समस्याओं पर चर्चा; जज़्ब:-ए-फ़ाक़ाकश: भूखे रह कर जीने वाले लोगों की भावना; क़ायम: स्थापित; अज़ल: मृत्यु, प्रलय; ज़ात-ओ-मज़्हब: जाति और धर्म; जल्व:गर: प्रकट, दृश्यमान; सरे-बज़्म:भरी सभा में; नज़्रे-मैकश: मद्यप की दृष्टि, दर्शन-रूपी मदिरा पीने वाले की दृष्टि; ज़र्फ़े-क़दह:पात्र संभालने का साहस 

1 टिप्पणी:

  1. bahut hi khoobsoorat...
    रौशनी जिसकी क़ायम अज़ल तक रहे
    ज़िंदगी को कभी वो: सुबह दीजिए
    ye khaas pasand aaya ...

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