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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

दिल कांपता है...

हैरतज़दा  हैं    हिंद   की    बुनियाद   देख  कर
हिलती  भी   नहीं    क़ुव्वते-फ़ौलाद   देख  कर

सीने  में  दर्द   चश्म  में   शबनम  तलक  नहीं
हम  हंस  पड़े  हैं  ख़ुद  को  यूं  बर्बाद  देख  कर

शे'रो -सुख़न     के    रास्ते    वीरान     हो  गए
क़ातिल  को    तेरे  शहर  में  आज़ाद  देख  कर

शीरीं   हो   सोहनी  हो   के:    लैला-ओ-हीर  हो
दिल    कांपता  है   इश्क़  की   रूदाद  देख  कर

आबो-हवा    बदल   गई   दहशत  में  हैं  परिंद
दरियादिली - ए- दामने-सय्याद      देख  कर !

                                                            ( 2013 )

                                                      -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: हैरतज़दा: आश्चर्य-चकित; बुनियाद: नींव; क़ुव्वते-फ़ौलाद: इस्पात की सामर्थ्य; चश्म: आंख; शे'रो-सुख़न: काव्य-कला; वीरान: निर्जन; शीरीं, सोहनी, लैला, हीर: मध्य-कालीन प्रेम-गाथाओं की नायिकाएं; रूदाद: वृत्तांत, महागाथा; आबो-हवा: पर्यावरण; दहशत: आतंक; परिंद: पक्षी; दरियादिली-ए-दामने-सय्याद: बहेलिए की विशाल-हृदय  उदारता।

1 टिप्पणी:

  1. bahut sunder jo jivan ko arth aur manjil kaye sath bharat kaye buniyadi dhanche ki taraf bhi sanket karta hai... gyan

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