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रविवार, 16 जून 2013

सिलसिला हो शुरू ...

हो  जुनूं-ए-मोहब्बत  तो  नायाब  हो
पुरसुकूं   दिल   रहे    रूह  बेताब  हो

सिलसिला  हो  शुरू  तो  रवायत  बने
तेरी आमद हो तो  ख़्वाब दर ख़्वाब हो

ये:  जबीं  नूर-ए-अल्लः  से  रौशन  रहे
तेरी  तस्वीर  भी  रश्क़-ए-महताब  हो

हो  ज़माने  की   आंखों  में   बदनीयती
तो  मुक़ाबिल  तेरी  नज़्र-ए-तेज़ाब  हो

हैं  तरक़्क़ी  के  मानी  तभी   मुल्क  में
तिफ़्ल दर तिफ़्ल  ईमां से  ज़रयाब  हो

एक  क़तरा  गिरे  गर  तेरी  आंख  से
दो-जहां    चार  सू      ज़ेरे-सैलाब  हो !

                                                                    ( 2013 )

                                                            -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: जुनूं-ए-मोहब्बत: प्रेमोन्माद; नायाब: अलभ्य, अप्राप्य; पुरसुकूं: विश्रांति-पूर्ण; रूह: आत्मा; बेताब: विकल; सिलसिला: क्रम; रवायत: परंपरा; आमद: आगमन; जबीं: मस्तक; नूर-ए-अल्लः : ईश्वरीय प्रकाश; रौशन: प्रकाशित; रश्क़-ए-महताब: चन्द्रमा की ईर्ष्या का पात्र; मुक़ाबिल: समक्ष; नज़्र-ए-तेज़ाब: तेज़ाब जैसी दृष्टि; तिफ़्ल दर तिफ़्ल: बच्चा-बच्चा;  ईमां  से  ज़रयाब: ईमान के सोने से समृद्ध; क़तरा: बूंद; गर: यदि; दो-जहां: इहलोक-परलोक; चार सू: चारों दिशाएं;  ज़ेरे-सैलाब: जल-प्लावित।

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