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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

देते हो धोखा ...

देते  हो  धोखा  महफ़िल  में
क्या  शर्म  नहीं  बाक़ी  दिल  में

ज़ंग-आलूदा  हैं  सब  छुरियां
वो  बात  नहीं  अब  क़ातिल  में

मुस्तैद  रखो  फ़र्ज़ी  अपना
है  शाह  तुम्हारा  मुश्किल  में

हम  सज्दा  करते  जाते  हैं
तुम  रंज़िश  रखते  हो  दिल  में

शम्'.अ  हमसे  कह  कर  देखे
हम  आग  लगा  दें  महफ़िल  में

तूफ़ां  तो  सिर्फ़  दिखावा  है
गिर्दाब  छुपे  हैं  साहिल  में

माज़ी  को  आग  लगा  आए
देखें  क्या  है  मुस्तक़्बिल  में  !

                                                        (2017)

                                                 -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: महफ़िल : सभा; ज़ंग-आलूदा : ज़ंग लगी हुई, क्षरित; मुस्तैद: सन्नद्ध; फ़र्ज़ी : शतरंज के खेल का सबसे शक्तिशाली मोहरा, वज़ीर; सज्दा:आपादमस्तक प्रणाम; रंज़िश: वैमनस्य; तूफ़ां: झंझावात; गिर्दाब: भंवर, जलावर्त्त; साहिल: तट; माज़ी : अतीत; मुस्तक़्बिल : भविष्य ।


1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-02-2017) को
    "उजड़े चमन को सजा लीजिए" (चर्चा अंक-2595)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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