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रविवार, 15 मई 2016

हिलाल है दिल का ...

आजकल  तंग  हाल  है  दिल  का
उलझनों  में  सवाल  है  दिल  का

कुछ  उन्हें  भी  ग़ुरूर  है  दिल  पर
कुछ  हमें  भी  ख़्याल  है  दिल  का

चैन  ख़ुद  को  न  राह  ख़्वाबों  को
इश्क़  क्या  है  बवाल  है  दिल  का

आशिक़ों  की  बड़ी  फ़जीहत  है
क़ब्र  में  भी  मलाल  है  दिल  का

तीरगी  रूह  पर  जहां  उतरे
रौशनी  को  हिलाल  है  दिल  का

इश्क़  पर  ही  सवाल  क्यूं  उट्ठें
बंदगी  भी  जवाल  है  दिल  का

अर्श  तक  ज़लज़ले  मचा  डाले
दर्दे-दिल  भी  कमाल  है  दिल  का !

                                                                     (2016)

                                                               -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ : ग़ुरूर : अभिमान ; ख़्याल : चिंता ; चैन : संतोष ; बवाल : उपद्रव ; फ़जीहत : दुर्दशा ; क़ब्र : समाधि ; मलाल : खेद ; तीरगी : अंधकार ; रूह : आत्मा ; हिलाल : नवोदित चंद्र ; बंदगी : भक्ति ; जवाल : अवनति, पतन ; अर्श : आकाश ; ज़लज़ले : भूकंप ; कमाल : चमत्कार ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-05-2016) को "अबके बरस बरसात न बरसी" (चर्चा अंक-2345) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. 'अर्श तक ज़लज़ले मचा डाले
    दर्दे-दिल भी कमाल है दिल का !'
    - वाह !

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