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शनिवार, 4 जुलाई 2015

...तो दुश्वार क्या है ?

तुम्हें  दिलफ़रोशी  की  दरकार  क्या  है
ज़रा  जान  तो  लो  कि  बाज़ार  क्या  है

नज़र  से  मुहब्बत  का  इज़्हार  करना
ये  आसान  है  गर  तो  दुश्वार  क्या  है

न  मिलना-मिलाना  न  घर  पर  बुलाना
हमारे   दिलों  की    ये  दीवार    क्या  है

लहू   एक   है    एक  ही    नस्ले-आदम
तो फ़िरक़ापरस्तों  की  तकरार  क्या  है

जहां   तूर   पर   जल्व:गर   आप   होंगे
वहां  दिल  धड़कने  की  रफ़्तार  क्या  है

ख़ुदा  से  जिरह  पर  जिरह  कर  रहे  हो
तुम्हारा    तरीक़ा-ए-गुफ़्तार     क्या  है

हमारी   अज़ाँ   पर  खिंचे  आएं  गर  वो
ख़ता  इसमें  बंदे  की  सरकार  क्या  है ?

                                                                                     (2015)

                                                                             -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (06-07-2015) को "दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए" (चर्चा अंक- 2028) (चर्चा अंक- 2028) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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