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सोमवार, 16 मार्च 2015

उनका असलहा होगा !

किसी   ने  कुछ  सुना  होगा  किसी  ने  कुछ  कहा  होगा
ख़बर  यूं  ही  नहीं  बनती,  कहीं  कुछ  तो  रहा  होगा  !

त'अल्लुक़  तोड़  कर  तुमसे  बहुत  कुछ  खो  दिया  हमने
हमें  खो  कर  मगर  तुमने  कहीं  ज़्यादा  सहा  होगा

परेशां      हम   अकेले   ही    नहीं  वादाख़िलाफ़ी  से
लहू  उस  बेवफ़ा  की  आंख   से  भी   तो  बहा  होगा

किया  था  आपको  आगाह  हमने  शाह  की  ख़ू  से
यक़ीं   के    टूटने   का  हादसा    अब  बारहा   होगा

अवामे-हिंद   हैं  हम,  जब  बग़ावत  को  खड़े  होंगे
हमारे    हाथ  होंगे   और  उनका    असलहा  होगा  !

                                                                                            (2015)

                                                                                   -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: त'अल्लुक़: संबंध; परेशां: व्यथित; वादाख़िलाफ़ी: वचन टूटना; बेवफ़ा: वचन तोड़ने वाला; आगाह: पूर्व-सूचित; ख़ू: स्वभाव, व्यक्तित्व; यक़ीं: विश्वास; हादसा: दुर्घटना; बारहा: बार-बार; अवामे-हिंद: भारत के जन-सामान्य; बग़ावत: विद्रोह; असलहा: शस्त्र-भंडार ।






3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-03-2015) को "मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती" (चर्चा अंक - 1921) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ख़ूब...............
    http://savanxxx.blogspot.in

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  3. बहुत सुन्दर
    त'अल्लुक़ तोड़ कर तुमसे बहुत कुछ खो दिया हमने
    हमें खो कर मगर तुमने कहीं ज़्यादा सहा होगा
    पीड़ा जताती पर आगाह करती सुन्दर रचना

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