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शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

नज़रिया ग़लत है....

ये  मुमकिन  नहीं  है,  कभी  दिन  न  बदलें
नए  दौर  के  साथ  कमसिन  न  बदलें

मुखौटे  जमा  कर  रखे  हैं  हज़ारों
बदलते  रहें  रोज़,  लेकिन  न  बदलें

सभी  लोग  हैं  मुतमईं  इस  शहर  के
ख़ुदा  भी  बदल  जाए,  मोहसिन  न  बदलें

बदलना  ज़रूरी  लगा  भी  उन्हें  तो
तहय्या  करेंगे,  मिरे  बिन  न  बदलें

नज़रिया  ग़लत  है  नए  हुक्मरां  का
अहद  कीजिए  वो  क़राइन  न  बदलें

ज़माना  कहां  से  कहां  आ  चुका  है
त'अज्जुब  नहीं  क्या  कि  मोमिन  न  बदलें

बड़ी  पुरअसर  है  अज़ां  दुश्मनों   की
अरज़  है  हमारी,  मुअज़्ज़िन  न  बदलें  !

                                                                                (2014)

                                                                       -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: मुमकिन: संभव;  दौर: कालखंड;  कमसिन: युवा, कम आयु वाले;  मुतमईं: आश्वस्त;  मोहसिन: कृपालु, प्रेमी;  
तहय्या: सुनिश्चित, दृढ़ संकल्प; नज़रिया: दृष्टिकोण; हुक्मरां: शासक-वर्ग; अहद: प्रण; क़राइन: सभ्यता के प्रतिमान, शिष्टाचार; 
ज़माना: समय; त'अज्जुब: आश्चर्य; मोमिन: आस्तिक जन; पुरअसर: प्रभावी; अरज़: निवेदन, प्रार्थना; मुअज़्ज़िन: अज़ान देने वाला।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (27-10-2014) को "देश जश्न में डूबा हुआ" (चर्चा मंच-1779) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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