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शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

बहुत ख़राब हैं हम !

हमें  क़रीब  से  देखो,  तुम्हारा  ख़्वाब  हैं  हम
जिगर  संभाल  के  रखना  कि  बे-हिजाब  हैं  हम

न  दिल  में  राज़  न  आंखों  में  मस्लेहत  कोई
किसी  भी  वर्क़  से  पढ़िए,  खुली  किताब  हैं  हम

तमाम  मन्नतों  से  हम  जहां  में  आए  हैं
बुज़ुर्गो-वाल्दैन  का  कोई  सवाब  हैं  हम

तुम्हारा  साथ  निभाएंगे  हर  ख़ुशी-ग़म  में
तरह-तरह  के  रंग  में  खिले  गुलाब  हैं  हम

हमारा  काम  एहतेरामे-हुस्न  है  यूं  तो
किसी-किसी  निगाह  में  बहुत  ख़राब  हैं  हम

हुआ  करें  हुज़ूर  शाहे-हिंद,  हमको  क्या  ?
रियासते-ख़ुलूसो-उन्स  के  नवाब  हैं  हम 

किसी  की  ख़ुल्द,  किसी  का  जहां,  किसी  का  दिल 
जहां  कहीं   रहें,  वहीं  पे   लाजवाब  हैं  हम  !

                                                                                    (2014)

                                                                            -सुरेश  स्वप्निल

शब्दार्थ: जिगर: मन; बे-हिजाब: निरावरण; मस्लेहत: गुप्त उद्देश्य; वर्क़: पृष्ठ; बुज़ुर्गो-वाल्दैन: पूर्वज और माता-पिता; सवाब: पुण्य; एहतेरामे-हुस्न: सौंदर्य का सम्मान; निगाह: दृष्टि; शाहे-हिंद: भारत का राजा; रियासते-ख़ुलूसो-उन्स: आत्मीयता और स्नेह का राज्य; नवाब: राजा; ख़ुल्द: स्वर्ग; जहां: संसार ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. हुआ करें हुज़ूर शाहे-हिंद, हमको क्या ?
    रियासते-ख़ुलूसो-उन्स के नवाब हैं हम


    एक एक शेर उम्दा.. उससे भी उम्दा... आभार

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  2. बहुत सुंदर
    आज हिंदी ब्लॉग समूह फिर से चालू हो गया आप सभी से विनती है की कृपया आप सभी पधारें

    शनिवार- 18/10/2014 नेत्रदान करना क्यों जरूरी है
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः35

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