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सोमवार, 21 अप्रैल 2014

बस्तियां जलाते हैं ...

हर   हुनर  हम  पे  आज़माते  हैं
जाने  किस-किस  से  सीख   आते  हैं

आप  जब  बेरुख़ी  दिखाते  हैं
रूह  की  मुश्किलें  बढ़ाते  हैं

दूर  रह  कर  निगाह  से  अक्सर
आप  नज़दीक़  हुए  जाते  हैं

आप  अपनी  क़सम  न  दोहराएं
हम  सभी  फ़ैसले  निभाते  हैं

मौत  आ  जाए  उन  ख़यालों  को
जो  उन्हें  बेवफ़ा  बनाते  हैं

दोस्तों  में  कमाल  का  दम  है
रात-भर   फ़लसफ़ा  सुनाते  हैं

वो:  तरक़्क़ी  की  बात  करते  हैं
और  फिर  बस्तियां  जलाते  हैं

आईना  देखते  नहीं  ख़ुद  वो:
ग़ैर  पर  उंगलियां  उठाते  हैं

बज़्म  में  सर  झुकाए  रहते  हैं
अर्श  से  बिजलियां  गिराते  हैं  !

                                                   (2014)

                                          -सुरेश स्वप्निल 

शब्दार्थ:  हुनर: कौशल; बेरुख़ी: उपेक्षा;   फ़लसफ़ा: दर्शन; तरक़्क़ी: प्रगति; बज़्म: सभा; अर्श: आकाश । 

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 23 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 'ह्यूमन कंप्यूटर' और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. लाजवाब गज़ल ... कमाल कि गज़ल ...

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  4. मौत आ जाए उन ख़यालों को
    जो उन्हें बेवफ़ा बनाते हैं.....................वाह बहुत खूब

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