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गुरुवार, 9 मई 2013

नई लूट की तैयारी

तेरी    उम्मीद    की    ख़ुमारी    है
आज   की   रात   बहुत   भारी   है

ख़्वाब  तक  में  नज़र  नहीं  आते
क्या  ग़ज़ब  आपकी  दिलदारी  है

उनके   हक़   में   हैं   दुआएं  सारी
अपने   हिस्से    में    बेक़रारी   है

बात   उठने   लगी   है  ग़ुरबा  की
फिर   नई   लूट   की   तैयारी   है

सांप  या  नाग  में  चुनें  किसको
मुल्क   के   सामने    दुश्वारी   है

रू-ब-रू  हों  अगरचे  क़ातिल  के
हमको  अपनी  अना  भी  प्यारी  है

बंदगी    मुफ़्त    में    नहीं   होती
कुछ   हमारी   भी    लेनदारी   है !

                                          ( 2013 )

                                   -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ:  ख़ुमारी: उनींदापन; हक़: पक्ष; दुश्वारी: दुविधा; रू-ब-रू: समक्ष; अगरचे: यदि कहीं; अना: अकड़;बंदगी: भक्ति।

1 टिप्पणी:

  1. भाई वाह क्या बात है
    बधाई

    उनके हक़ में हैं दुआएं सारी
    अपने हिस्से में बेक़रारी है

    बात उठने लगी है ग़ुरबा की
    फिर नई लूट की तैयारी है

    __वाह वाह ....जय हिन्द !

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