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शनिवार, 24 नवंबर 2012

अपने घर भी रहा कीजिए


और     उम्मीद      क्या      कीजिए                         
हो     सके      तो   वफ़ा      कीजिए

हाथ    आए     न    जब    काफ़िया
दिल से    इस्लाह    लिया   कीजिए
        
कब    तलक    दिल के   दुखड़े सुनें
कुछ   नया    भी     कहा    कीजिए

दिन-ब-दिन दिल-ब-दिल दर-ब-दर
अपने     घर   भी    रहा     कीजिए

दिल में   आ  ही  गए  हैं    तो    ख़ैर
अब     यहीं     बोरिया        कीजिए

ऐ    अदम    आज   तो   बख्श     दे
वो  हों   मेहमाँ    तो   क्या   कीजिए

हम    चले     उनकी     आग़ोश    में
मोमिनों       रास्ता            कीजिए !
                                                            (2010)

                                                    -सुरेश  स्वप्निल 

शब्दार्थ: 

3 टिप्‍पणियां:

  1. कल 03/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. दिल में आ ही गए हैं तो ख़ैर
    अब यहीं बोरिया कीजिए
    ऐ अदम आज तो बख्श दे
    वो हों मेहमाँ तो क्या कीजिए
    ..
    बहुत खूब रही!
    विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं